तीन रंग उत्तराखंड का पहाड़यों का

Uttarakhand Ka pahadi,

ना त् कभि देखि, ना त् कभि पच्छांणी, बल कन्न हौन्दा ई पहाड़ी. यूं कु क्या रूप रंग हौन्दू। यू कु सुभौ सग्वोर् कन्न हौन्दू, लोग ब्वोदा यूंकु जीवन बड़ु कठिन हौन्दू क्या सच्च मा ईं तैं लैख् छन्न। या फिर ई खालि दिखैंणा का पहाड़ी छन्न. यूं का सि बांदरा पुछणा जन्न् पुंगणा, यूं का सि द्वी मुट जन्न् सग्वोड़ा। फिर भी यूंका सि भर्यां नाजा कोठार। बिना ताला का म्वोर संगार, झपन्याला डाला बौंण सार. यूं कि स्या बरफीली हिवांली। यूं कि स्या च्या कि कितली। यूं कि स्या कांसे थकुलि। यूं कि स्या घ्यू कि मंडली। यूं कि स्या तिबारी डंडयालि। यूं का सि बीर सपूत। यूं का सि देव दूत। यूं कि स्या गंगा जमुना, यूं कि स्या फ्योंलि काठ्यूं मा। यूं का सि भैला बग्वाल्। यूं का सि देवता धुंयाल। यूं का सि गढ़ सुम्याल। यूं का सि भूमि का भुम्याल। ह्वे ता चा यू उत्तराखण्ड का मनख्यूं मा।।।हौर कुछ छौ त् बथै द्या। बथौंण का भला मनखि बस एैथर  सब लिख्यूं चा कि पहाड़ी क्या हौन्दा.

पैलू – हिवांला कु पहाड़ी मनखि। 

ह्यूं कि ढांडोन सेक्यूं मनखि चा। पौन् पंछी डांडी कांठी वैका हिस्सा का दगड्या छन्न्, तांदी झुमैला बार तैवार पंचनाम देबता वैका बुत्यां बीज छन्न्। जु सार्यूं मा खिली क् वैकि ज्यूंनि तैं एैथर हिंटौन्दा। ऐड़ी आच्छिरिं वैकि दिसा ध्यांणि छन्न्। पांच भै पंडौ वैका रक्षक छन्न्। ऊंचा सागरू भ्यौरा बखरा छौना चिनखा वैका ज्यूंणा का सारा छन्न्। वैका पाल्या म्वारा वैकि दिसा ध्यांणू कि खबर सार लौंदा। वैका सि भौट्या कुकूर गाजी पात्यों गौं गोठ्यार की सेवा लौंदा। वै कि लाडी ब्यटुलि डांडि कांठ्यों थैं सैंतदा पाल्दा।  वैकु सु दोख्या पैरवार्, वैकु सु ऊना कु ताकुलु। वैकु सु लव्वा पागुणु। वैकु सु गात कु आंगुणु। वैकु सु हाथू कु धगुलु पैरिकि जब डांडयूं कांठ्यूं मा जांदू त् बंणू मा बणांग लगि जांदू। डांडयूं कु चौमास भी देखणां कु अपणु रंग रूप खत्यौंदू। वै का गौ कु बाटू, वैका पुंगणों कु माटु. जब क्वी हिटि जांदू या अपणी मुठ्यों मा ल्यौंदू त् वैकि खैरी पच्छांणदू. यु हौन्दु हिंवाला की पहाड़ी मनखि.

द्वोसरू – गगांड़ कु पहाड़ी
ज्यूं थैं डांडा गौं का मनखि गगांड़ ब्वोदा, उंथैं सल्यांण्यां भी ब्वोदा. यु भी ये पहाड़ कु मनखि चा। जन्न हिवांला गौं कु मनखि चा उनि गंगाड़ जन क्वी गंगा जी का छाल को, अलकनन्दा घाटि को। भिलंगा धौली को। सतपुली नयार को। भाभर को, नगपुर गढ़ को। सैंणा श्रीनगर यु मनखि चा. रोपण्यों का पुंगणा का माटा मा सेक्यूं मनखि चा यु अर् ज्येठ का तैला घाम मा सेक्यूं पहाड़ी चा. बगदी गंगा ये कि ज्वोनि को खून चा सुबेरे उठि गाड छालों की स्वीली हवा सी येकु सुभौ चा. ये कि सि सैंणी पुंगड़ो की सार, यैका चौक तिबारी की बहार चा. ग्वीराल अर् गाडों का माच्छा यैका मुल्क की पच्छांण चा. असाड़ा रोपड़िं मा सौर्यां यैका पुंगड़ा जीतू बगड्वाले माया चा. अर् कक्खि माधो सिंह भंडारी का कूखे ल्वे चा. यैका गौथू अर् घर्या प्याजा पुंगणों की जु सार चा. कक्खि ना कक्खि यैका पीढ़यूं कु सैंत्यू पाल्यूं घौर चा स्येरा चा. डांडा गौं कु मनख्यों कु जिंदगी कु भारू पिठी मा रौंदू अर् यैका मुंड मा. 

तिसरु – शहरू कु पहाड़ी
अगर दिख्येजौ त् शहर मा शहरी मनखि रौंदा, यक्खि कुछ मनखि यन्न भि रौंदा ना ति सि अब पहाड़ी छन्न, ना ति सि अब शहरी छन्न। सि शहरू का पहाड़ी छन्न। ब्वोले जौत् सि गंगा जी का जौ छन्न. जु पहाड़ बटि रौंड़ी बगीतें यूं शहरे या बस्यां छन्न। अन्वार भी यूंकि पहाड़ी चा। जात भी पहाड़ी चा। बस यूं कु पैरवार बदल्यूं चा। भौंण कुभौंण बदल्यूं चा. यूंका भि कभि पहाड़ू मा स्वोरा भारा छा। बौंण छा, सग्वोणा छा, पुंगणा छाखर्क छा. पर यु ये गढ़ देश कु सबसे बुझ्यूं सग्वोरदार अर् धैर्यवान मनखि चा। ये कु जिकुड़ु भारि कर्मठ चा अर् साहसी भी चा कि, साहसी यांतें छौं मि ब्वोनु यु स्वे मनखि चा जेकि अपणी जलम भूमि छौंड़ी चा। पितरूं की खरि कमायी कूड़ि बांजा धरि चा. अर् यूं शहरू मा ऐकि यु बड़ु थौकदार बड़यूं चा। बिल्डर बड़यूं चा. जबार तक ये मु बाड़ि सग्वोड़ि छे यूं भी खूब पहाड़े की बात करदू छौं जनि येन् नौकरी क्या पाई येका पुंगड़ा माटू रूखू ह्वेगी छो येथैं. भले यु अफू थैं कति भी भौतिकवादी समुझूदु पर यैंका गिच्चा बटि एक बात निकली जांदी। की हम पहाड़ी छां. अर् यांका खातिर यैकि अपणी पच्छांण बचौणां खातिर शहरू मा पहाड़ी संगठन व समिति छन्न बड़ांई. अर् तौं संगठन अर् समित्यों का नौं पहाड़ का सिद्धपीठ, पंचधाम, जगा का नौ से छन्न् रख्यां। ज्वोकि यैकि नई न पहल चा अपणां पहाड़ की संस्कृति बचौणां खातिर. अर् एक तरफ से यु बहुत सरानीय कदम चा। पर यूं समित्यों कु राजनितिक फैदा भी खूब चा हमरा देश मा. यु अपणी भाषा खूब बींगदू पर बच्या नि पौंदू। ईं बात कु येथैं दुख भी नि। जब पहाड़ का मा रौंण वाला नि छन्न ब्वोना त् यैका गौला किलै हो सुद्धि पिड़ा।।।। आखिर यु भीत् शहरू कु पहाड़ी चा.

 आखिर उत्तराखंड कु पहाड़ी –
उत्तराखंड अफू मा अखंड चा. यैका बूत्यां मनखि आज देश विदेशूं मा अपणा मुल्क कू नौ छन्न कमौणां. यखो पहाड़ी आज हर् धांण काज मा अपड़ी ईं देव धरा कु मान सम्मान छन्न कन्न लग्यां. यखौ धार-खाल, रौंली-कांठी, तैला-हिवांला कु मनखि अपणा भला सुभौ से ये भारत खंड मा अलग ही पच्छांण बंणौदू. जन्न् यखे गंगा जमुना सेरा जनमानस बटि समोदर की तीस बूझोंदू, यनि ये उत्तराखंड कु पहाड़ी मनखि अपणा पसिन्यान् आज देश की माटी थैं ता चा सीचणूं. यु पहाड़ी पर्वत सी अपणि चमक धमक संगती चा बिरयोंणू. अर् देस का राजि खुशि का खातिर दिन रात अपणी पीठि ,मुंड, कांधि, हाथ सभि जगा से सेवा मा लीन चा हुयूं. 
पर हम पहाड़ी आज जक्ख् भी रौं पर अपणी तैं पहाड़ कतै ना बिसरों अपढ़ा बांठा सैणा पुंगणों तैं सींचणे कोशिस करौं. किलै कि भविष्य कैन नि देखी। यू शहरूं का पैथर हमरी पीढ़ी ज्यादा देर तक फली फूली नि सकदि चाहे हम नोटू का नौट्याल बंण जौं। हमथै क्वै अगर सैंती पाली अर् मेहनत कन्न सिखे सकदु त् सु यो पहाड़ चा यै मा ही हमरी पीढ़ी पनपी सकदी. 

पर हम पहाड़ी आज जक्ख् भी रौं पर अपणी तैं पहाड़ कतै ना बिसरों अपढ़ा बांठा सैणा पुंगणों तैं सींचणे कोशिस करौं. किलै कि भविष्य कैन नि देखी। यू शहरूं का पैथर हमरी पीढ़ी ज्यादा देर तक फली फूली नि सकदि चाहे हम नोटू का नौट्याल बंण जौं। हमथै क्वै अगर सैंती पाली अर् मेहनत कन्न सिखे सकदु त् सु यो पहाड़ चा यै मा ही हमरी पीढ़ी पनपी सकदी. 

लेख – हरदेव नेगी

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