garhwali kavita

कुछ तुमुन

कुछ तुमुन फरकै, कुछ मि फरकोलु. कुछ तुमुन सनकै, कुछ मि सनकोलु. कुछ तुमुन चितै, कुछ मि चितोलु. कुछ तुमुन बिंगै, कुछ मि बिंगोलु. कुछ… Read More »कुछ तुमुन

ऋतु बोड़ीगे

ऋतु बोड़ीगे चौमासा, डांडयों बासिग्ये हिलांसा. रौड़ी दौड़ीक् सार्यूं बीच, मैनू एैग्ये बल चौमासा. नैल्ये गोडें मा लगि भग्यान, क्वोदा झंगोरा कि सार्यूं मा. बरखा… Read More »ऋतु बोड़ीगे

सौंगू दिख्येदूं

सौंगू दिख्येदूं पर ठुक एैंच आगास चा, ये गौं का बाटा कु……….! पय्यां डालि किलै सूख्यूं चा……….। घस्येनू कु आढासु छों जैंका छैल् स्कूल्या दगड़यूं… Read More »सौंगू दिख्येदूं

अन्वार

स्वांणी मुखड़ी फ्योलीं जन चार। कजर्याली आंखी जन ब्वे की चार। जिदेर जिकुड़ी अर् बालू मन। सच्ची ब्वोला! कैंकि ह्वेली ईं पर अन्वार।    … Read More »अन्वार

गढ़वाली कविता “टेक्वा”

मेरि जिंदगी कु घाम अच्छलांण लैग्ये। अंधेर संगती बिंरयूं चा, उंदार तरीक उकाल छौं जांणू। अब ये टेक्वा कू सारू चा. नांगा खुट्यों हिट्यूं मि… Read More »गढ़वाली कविता “टेक्वा”