“सी मनखी अब यख नि रैनी”

Si Mankhi  Ab Yakh Ni Raini - Garhwali Kavita.

हिमालय से बड़ी गाथा च जौंकि,
सी मनखी अब यख नि रैनी,

जौंन दीनी अंश अंश अपनी देह कु यिं माटी ते,
बून्द बून्द खून की सींची जौंन ये माटा मा.
रूढ़ि का तैला घाम फीका जौंका समणि,
बसग्यली कुएड़ि पैली सेवा जौं ते लगान्दी
सी मनखी भौत दूर ह्वे गैनी अब त,,,
सी मनखी अब यख नि रैनी।।

 

जौंन ज्वानि की असली पट्टी पढ़ाई,,
हमकू दिन्या सुख सेरा सजीला संस्कार.
दिखाई बटु जौंन मन्ख्यात कु हमुक,
दिखाई हरयु भरयु संसार.
छा कुछ मेरा भी जु मीमा नि रैनी,
सी मनखी कखि दूर चलगिन.

हाथ पकड़ी हिटूणु सिखाई,
जौंन बचपन मा दुरू दुरू की सैर कराई,
म्येरी खुशी का खातिर मि कंधा मा बिठाई,
जौंका बुढया शरिरन कभी पीड़ा नि चितायी.
कख हरचिन वो कख अब गैन ,,,
सी मनखी अब यख नि रैनी।।

जौंकि सजायी या विरासत पुरखो की,
जौंन रचाई बसाई या डेली पुन्गडी.
जौन लगेँन पवाड़ा पण्डों का अमर करी,
जौंन ढोल की थपकी
हमारा सी पितर पूजनीय छन सदानी,
जु मनखी अब यख नि रैनी।।

 

जौंका करया कमाया का हकदार हम छन्न,
जु हमरा वास्ता खून पसीना बगे गैनी.
जौका इतिहास पढ़ना का हकदार हम छन्न,
जु अपणी गाथा का नया नया पन्ना गढ़ी गैनी,
वीर मनखी अब कख गैनी,,,,,
सी मनखी अब यख नि रैनि।।

 

लेख:- नीलम रावत

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