सांखी:- गढ़वाली कविता

sankhi garhwali kavita,

स्या एक मुट ऊजाल्यू जन;
घिंदूड़ी की पांखी सी।
स्या बाबा की ब्यटुलि जन त्…..;
ब्वे की सांखी सी..!

स्या बसंत ऋतु जन
त्सूखी डाली मोल्यार सी।
स्या रूढ़ी को घाम जन
पूसे स्वीली रात सी।
स्या बाबा की ब्यटुली जन त्।
ब्वे की सांखी सी,     

       स्या दयूर भोजू मजाक जन त्।           
सौर्यासे सासु रिसाण सी         
स्या भै बैंड़्यो प्यार जन त्।           
राखी को त्यौहार सी.           
स्या बाबा की ब्यटुली जन
ब्वे की सांखी सी।

स्या दादा दादी लड्या जन त्।
मामा मैई दुलार सी
स्या गैल्याण्युं दगड़ू जन त्।
मेला थौलों बार सी
स्या बाबा की ब्यटुली
जन ब्वे की सांखी सी।

स्या कुरीत्यों की भेंट चड़ी जन त्।
ब्वे की सूनि खोक् सी…..!
स्या नौन्यालै आस मा जन त्……..!
सूनु पड़यु चौक सी……!
स्या बाबा की ब्यटुली
जन ब्वे की सांखी सी।

स्वींणा सुधि देख्यां वीं ब्वे का जन त्।             
स्या झपन्याली फूले डाली सी…….!             
कुसाग्वोर्युन मारि जन त।             
ल्वेन् भरि डाक्टरे थाली सी….!           
स्या बाबा की ब्यटुली
जन ब्वे की सांखी सी।

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