पंथ्या दादा

Panthya Dada

सतरहवीं शताब्दी के दौर में जहाँ भारत वर्ष के अधिकांश भागों में अंग्रेजों की हुकूमत का स्वामित्व स्थापित हो चुका था वहीं उत्तराखंड के पहाड़ी भू भाग पर पहाड़ के राजाओं व गोरखाओं का स्वामित्व था, तथा उत्तराखण्ड का गढ़ों में विभाजित था, और ये गढ़ उत्तराखण्ड में पाई जानी वाली समस्त हिंदू जातियों के आधार पर विभाजित थे. जिनका उल्लेख गीतों व इतिहास के पन्नों में विस्तृत है. उस समय जो गढ़वाल रियासत थी उसकी राजधानी श्रीनगर गढ़वाल हुआ करती थी और इसके आस पास का छेत्र खासकर पौड़ी व टिहरी गढ़ो की रियासत में बंटा था. उन दिनों श्रीनगर गढ़वाल में राजा मेदिनी शाह का स्वामित्व था. वहीं श्रीनगर से सटे कटुलस्यूं पट्टी जो कि नयाल गढ़ के छेत्र में आता था, इसी कटुलस्यूं पट्टी के सुमाड़ी गाँव में पंथ्या दादा का जन्म हुआ था. बच्चपन में पथ्यां दादा ने अपने माँ पिता को खो दिया था. उसके बाद पथ्यां दादा का पालन पोषण उनकी दीदी बहन के घर में हुआ जिसका ससुराल फरासू गाँव में था. सुमाड़ी गाँव की कुल देवी माँ गौरा देवी थी जिसकी ताथी में ये गाँव बसा था तथा गाँव सबसे ज्यादा मवासे काला जाति के ब्राह्मणों थे और वो ही गौरा देवी के पुजारी व अनुयायी थे व हैं, जब राजा जयपाल ने अपनी राजधानी चाँदपुर गढ़ से देवलगढ़ स्थान्तरित की थी तब उन्होने सुमाड़ी छेत्र को काला जाति के ब्रह्मणों को दाना कर दी थी कयोंकि वे देवलगढ़ स्थित माँ गौरा देवी के उपासक/ पुजारी थे.वही माँ गौरा के सभी तरह के अनुष्ठान व पूजा पाठ करते थे. यही देखते हुए राजा जयपाल ने सुमाड़ी की भूमि को सभी तरह के राजकीय करों से मुक्त रखा था और सुमाड़ी के लोगों को किसी भी प्रकार का कर नहीं देना पड़ता था.

 

श्रीनगर गढ़वाल में मेदिनी शाह के दरबार में सुमाड़ी का सुखराम वजीर था, वहीं राजा के कुछ दरबारियों का सुखराम काला से नाता ठीक नहीं था, और उन राज दरबारियों की नजर सुमाड़ी की छेत्र की कर मुक्त भूमि पर लगी थी, और व सुमाड़ी के लोगों से सभी प्रकार के करों को लागू करना चाहते थे. और वो सभी दरबारी राजा मेदिनी शाह के कान भरने लगे आखिर कार राजा ने सुमाड़ी गाँव के लोगों को सभी प्रकार के राजकीय कर, दूणखेणी, स्यूंदी, और सुप्पा जैंसे करों को लगाने का आदेश दिया, और अगले ही दिन वजीर सुखराम सुमाड़ी गाँव गया और राजा के आदेशानुसार लोगों को सभी प्रकार के कर जमा का फरमान जारी किया, जब गाँव के सभी लोगों तक यह हुक्म पहुँचा तो उन्होने राजा जयपाल के वचनों का हावाल देते हुए सुखराम को कह दिया कि श्रीनगर दरबार में हमारा भी आदेश पहुँचा दो कि हम किसी भी प्रकार का दान नहीं देंगे क्योंकि यह जमीन हमको दान में राजा जयपाल ने दी थी और जिस पर किसी भी प्रकार का कर नहीं लगाने का आदेश दिया था, जब सुखराम ने ये बात श्रीनगर दरबार में राजा मेदिनी शाह को सुनाई तो वो सुमाड़ी के लोगों पर और क्रोधित हो उठे और उन्होने तुरंत सुखराम को कहा कि सुमाड़ी के लोगों को ये रैबार पहुँचा दो या तो सभी प्रकार के करों का भुगतान करे या तो गाँव खाली करदें. सुखराम बजीर अपने दो चार सिपाहियों के साथ सुमाड़ी पहुँचा और फिर राजा का फरमान सुनाया ये बात सुन कर गाँव के पंच और सभी गाँव वासी हक्कै बक्कै रह गये. सभी ने राजा के इस फरमान का विरोध किया रात के समय गाँव में पंचायत बुलाई गई जिसकी अगुवाई पंथ्या दादा ने की, और पंथ्या दादा ने गाँव वालो को एक सुर राजा की इस नीति का विरोध किया, और कहा चाहे हम मर जायेंगे पर अपने गाँव को ना छोड़ेंगे और ना ही कर देने को कहा. ये रैबार भी जब राजा मेदिनी शाह के दरबार पहुँच तो राजा और क्रोधित हो ऊठा जो कि अब राज दारबार के आदेशों व अस्तित्व के सम्मान की बात थी, राजा ने अपने निरंकुशता की सारे अधे पार कर वो फैसला सुनाया जिसका कभी सुमाड़ी के लोगो ने भी नहीं सोचा था, कि जब तक सुमाड़ी गाँव के लोग राजा की आज्ञा का पालन नहीं करते तब तक सुमाड़ी से रोज एक व्यक्ति को अपनी बलि देनी होगी व गाँव में ही एक अगिन कुंड बनाकर वहाँ पर बलि देने होगी. जब ये रैबार ढोल की छाप बजीर सुखराम ने सुमाड़ी के लोगों को सुनाया तो उनमे भय का महौल फैल गया और लोग क्या करैं क्या ना करैं इस पर विचार करने लगे.

 

अब रात को फिर पंचायत हुई गाँव के कुछ मवासे कर देने को राजी हो गये पर पंथ्या दादा राजा की इस बात को मानने के लिए राजी नहीं थे, चाहे जान क्यूँ ना चली जाए पर हम राजा के आदेशों के आगे नहीं झुकेंगे ये हमारे मान और स्वाभिमान की बात है, आखिर हम आने वाले समय में अपनी आने वाली पीढ़ी को क्या जवाब देंगे. पंथ्या ने गाँव वालों को एक होकर राजा के आदेशों को न पालन करने को कहा और कहा कल जैंसे ही सुबह होगी मैं खुद श्रीनगर राजदरबार मे जाकर राजा के इस फरमान के विरूद्ध आवाज उठाऊंगा, पर अपनी गाँव की मिट्टि पर कर नहीं दूंगा चाहे मुझे सबसे पहले अपनी ही बलि क्यूँ ना देनी पड़े. और गाँव के लोगो ने अपने स्वाभिमान की खातिर इंसान की बलि दोना उचित समझा, पंथ्या भैजी नहीं चाहते थे कि पंथ्या कुछ एैंसा करे, पंथ्या के भैजी और बौजी विचार किया कि जबतक पंथ्या यहाँ रहेगा वो अपनी जिद्द से नहीं हटेगा क्यों ना उसे उसकी दीदी के ससुराल भैंज दे जब तक वो वहाँ रहेगा दो चार दिन में यहाँ भी सब ठीक हो जायेगा. और जैंसे ही पंथ्या घर आया तो उसके भैजी और बौजी ने पंथ्या को उसके दीदी के सौर्यास जाने को कहा, और पंथ्या अपने भैजी का कहना नहीं ठुकरा सकता था, पर दिल से पंथ्या इस हाल में गाँव से दूर नहीं जाना चाहता था, और अगले ही दिन पंथ्या फरासू अपने दीदी के गाँव चला गया.

 

सुमाड़ी गाँव में काला जाति के आलाव तीन और परिवार रहते थे उदाण कुटुम्ब, भगढ़ और पैलू. और उदाण कुटुम्ब सबसे बड़े भाई का परिवार था. और परंपरा के अनुसार सबसे पहले बलिदान देने का पंथ्या के भाई के परिवार का था, उधर पंथ्या अपने दीदी के ससुराल फरासू में जंगल में गायों को लेकर जंगल जा रखा था. जंगल में एक आराम करने लायक जगह पीठ बल आसन लेकर लेट गया और उसे वहीं नींद आ गई, और पंथ्या दादा के सपने में माँ गौरा देवी प्रकट हो गई, और पंथ्या को गाँव के वर्तमान हालत से अवगत कराया, पंथ्या दादा की नींद टूट गई और अपने इधर उधर देखा तो हल्का अंधेरा छाने लगा, पंथ्या ने गायों को इकट्ठा करके वापस गौशाला ले आया, व अपनी बहन से अपने गाँव वापस जाने की अनुमति मांगी और अंधेरे में ही सुमाड़ी चला आया. जब गाँव पहुंचा तो जो कुछ भी सपनो में देखा वो सब सत्य और साक्षात नजर आ रहा था, राजा द्वारा जो आदेश गाँव वालों को दिया था उसका पालन करने को गाँव वाले मजबूर हो गये थे, तत्पश्चात पंथ्या ने अपने गाँव वालों का अभिमान व स्वाभिमान को बचाने के खातिर आखिर बार अपनी कुल देवी माँ गौरा के चरणों में अतिंम बार अपना शीश झुकाया और सबसे पहले खुद आत्मदाह करने का प्रंण लिया, और उसके बाद पंथ्या दादा ने अग्नि कुंड में सबसे पहले अपने प्राणों की आहुति देकर गाँव के स्वाभिमान के लिए अपना बलिदान दे दिया, इस घटना से आहत होकर पंथ्या की चाची भद्रादेव देवी ने अग्नि कुंड में खुद शरीर को त्याग दिया, और फिर बहुगुणां परिवार एक बालिका ने भी अपने प्रांण त्याग दिये. और एक ही दिन एक ही गाँव के तीन लोगों द्वारा अग्नि कुंड में आहुती देने से पूरे सुमाड़ी गाँव में मातम पसर गया. जब ये खबर श्रीनगर राजा मेदिनी शाह के दरबार में पहुंची तो राजा ने गाँव में विद्रोह न होने की डर से अगले तीन दिन तक गाँव वालों को मानव बलि ना देने का फरमान सुनाया. पर राजा की निरंकुशता के कारण राज परिवार पर दैविक प्रकोपो का असर होने लगा, और दिन प्रतिदिन राजा की समस्या और बढ़ने लगी.

 

इन घटनाओं के निवारण के लिए राजा ने राजपंडित से इसका निराकरण सलाह मशविरा लिया और तत्काल समाधान करने पर विचार मांगा, तब राजपंडित ने राजा को बताया कि यह दैविक समस्या निरपराध पंथ्या के आत्मदाह से उत्पन्न हुई है, और इनकी आत्मा की शांति के लिए विधिवत पूजा-अर्चना करना ही इसका निवारण हैं. और राजा ने अपनी विपत्ति को दूर करने के लिए इसका आदेश दे दिया. सुमाड़ी पहुंच कर राजा ने मृत आत्माओं की शांति के लिए सभी प्रकार के कर्मकांड व पूजा पाठ व घडाल्या भी लगवाया और वचन दिया किया हर वर्ष पूस के महीने में श्राद्ध के रूप में विधिवत पूजा करेंगे. और तब से लेकर वर्तमान समय में सुमाड़ी के लोग हर वर्ष पूस के महीने में यह पूज करते हैं. राजा मैदिनी की क्रूरता के खिलाफ सर्वप्रथम आत्मदाह करने वाला बालक पंथ्या दादा थे. जिसने गढ़वाल के इतिहास के पन्नों में अमिट छाप रखी. सुमाड़ि गाँव की जनता आज भी बड़े स्नेह व सम्मान के साथ पंथ्या दादा का गुणगान करती है.

 

बालपन को  छुट्यो लाड, धर्मघात मारिग्ये.
जैं गुठ्यार ढंग से भि नि भैंटी छौ.
वींका खातिर पंथ्या जौंरा हाथ चली ग्ये.

लेख आभार
प्रोफेसर राकेश भट्ट गुरुजी
गढ़वाली नाट्य कार

लेख:- हरदेव नेगी

7 thoughts on “पंथ्या दादा”

  1. बीरेंद्र सिंह नेगी

    निसंदेह पंथ्या दादा की यह गौरव गाथा हमें अपनी जन्मभूमि से प्यार करना सिखाती है। ऐसे महापुरुषों के चरणों में कोटि-कोटि नमन।।

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