पहाड़ी रिक्रूटर (नौकरी लगाने वाला रिश्तेदार)

pahadi recruiter by pahadi blogger

 

वैंसे तो रिक्रूटर ज्यादातर एच आर (HR Recruiter) ही होते है जो अपनी विशेषज्ञता के आधार पर उम्मीदवार का चयन करते हैं, पर इन सबसे पर्याय एक एैंसा मनखी जिसके पास ना तो व्यापार प्रबंधन (Business Management) की दक्षता है ना ही वो कोई आयोग, वो है पहाड़ी रिक्रूटर (Pahadi Recruiter) जिसने ना जाने कितने पहाड़ के लड़कों की नौकरी लगाई है मेरा मतलब देहरादून, हरिद्वार, पंतनगर रूद्रपुर, दिल्ली चंडीगढ़ और मुम्बई जैंसे शहरों में पहाड़ के लड़कों की मवासी बनाई है, मवासी का बनाई फूल सी खिलाई है. दरअसल आज उत्तराखंड के हर गाँव से कोई ना कोई मनखि इन शहरों में नौकरी करता है खासकर प्राइवेट कंपनी में छोटे व पाँच सितारा होटलों में , और इन्हीं निजी क्षेत्रों में पहाड़ी रिक्रूटर पाया जाता है, जिसका नौकरी लगवाने का तरीका सबसे अलग है वो भी बिना किसी शर्त के, इतना ईमानदार कि अगर ये कहेगा कि मैं छलनी पर भी पानी लाया था तो लोग तब भी इस पर विश्वास कर लेंगे.

जब भी गाँव में कोई लड़का किसी मजबूरी या कारण वस दसवीं या बारहवीं से आगे नहीं पढ़ पाता, तो एैंसे युवाओं पर पहाड़ी रिक्रूटर की नजर होती है, खासकर पहाड़ी रिक्रूटर गाँव तब आता है जब गाँव में किसी की शादी हो या कोई त्यौहार हो तब एैंसे सजधज कर आता है कि जनरल मैनेजर से कम नहीं लगता, गात पर सेंट की खुशबू धार प्वोर तक आती है इसकी, 99 रूपये वाला रेबिन का नकली चश्मा, संडे मार्केट के लतै कपड़ै अहा ड्रेसिंग सेंस इसका गजब रहता है भले दिल्ली में वो दस नंबर वाली बीड़ी पीता हो व देशी ठर्रा घुटकता हो पर गाँव आते है गोल्ड फ्लैक और व्हिस्की से नीचे बात नहीं करता. और ये मौका होता है इसके एैंसे लाटे लड़को को अपनी छिफली गिच्ची में फसाने का, अरै भुला क्या तू घर में दिन काट रहा क्यों अपना भविष्य बरबाद कर रहा, मैने तेरे लिए एक अच्छी खासी नौकरी देखी है,

नौकरी लगाने का इसका क्राईटेरिया सबसे अलग होता है, भुला पंदरा हजार महीने का रहना खाना सब फ्री, जरा दो चार ढंग के कपड़े पहन लेगा और घर भी कमा के देगा तो बुरा क्या है, तुझे बस तीन महीने की ट्रैनिंग करनी उसके बाद तो छक्केपंजे है तेरे, बाकी आगे तेरी मरजी तू देख ले, तुझे घर में हौल लगाना या दूध बेचना है या फिर चार पैंसे कमाकर इज्जत की नौकरी करनी है वैंसे भी रखा क्या है इन पहाड़ों में, बस ये बात सुनते उसके मन में कौ बौ होने लगती है और पहाड़ी रिक्रूटर पर उसको अपने भविष्य बनाने का भरोसा हो जाता है, पर वो ही लाटा जिसे ये पता नहीं है शहरों में 10 व 12 पास वाले को आफ़िस बौय व होटलों में बर्तन धोने के वाला कोई नौकरी नहीं मिलती, उसके ब्वे बाबा भी अपने उस रिश्तेदार की बात मान लेते हैं बल गढ़वाली में एक कहावत है (कांणा त्वै क्या चैंदा द्वी आंखा सांणा) मतलब की अंधे को दो आँखो के सिवाय और क्या चहिए, और उसके ब्वे बाबा के लिए ये बात किसी अंधे को राह दिखाने वाली बात से कम नहीं है, और एैंसे ही बातों में फंसाकर पहाड़ी रिक्रूटर दो चार लड़को को जो कि वे उसके गाँव व रिश्तेदारी के होते हैं उन्हे शहरों में ला देता है, और अपना कमीशन खाने के चक्करों में ठेकेदारी वाली कंपनियों में काम लगवा देता है व किसी पाचं सितारा दिखने वाले होटल में लगवा देता है, और एक दो हफ्ते तक तो फुल टच में रहता है पहाड़ी लड़कों के, और ये वो जगह होती है जहाँ एक बार इंसान घुस जाए समझो बाहर आना मुश्किल हो जाता है, फिर जब कंपनी में तीन महीने पूरे हो जाते हैं तब उनको ठेकेदार तीन हजार से बढ़कर 6 या 7 हजार तक सैलरी देता है, और जहाँ आठ घंटे काय करना होता है ठेकेदार उनका काम 10 घंटे का कर देता है जिंदगी नरक से बदत्तर हो जाती है उनकी, जब भी अपने उस पहाड़ी रिक्रूटर से कपंनी के कामकाज के बारे शिकायत करते हैं तो “अरे भुला मेहनत नि करला त खाला क्या” जैंसे शब्दों से उनके अरमानो को कुचल देता है, और उनसे उनकी जिंदगी छीनना शुरु हो जाती है,

एैंसे आज भी बहुत अधिक गांवों के युवा हैं जिनके भविष्य का शोषण उसके पहाड़ी रिक्रूटर (रिश्तेदार) द्वारा किया गया, लाटेपन व मजबूरी का फायदा उठाकर बेचारों कि जिंदगी ठेकेदारी की गुलामी में घिसता है, जिसने शहरों में आकर खुद की मवासी तो नहीं बनाई पर औरों कि बिगाड़ने में अव्वल रहता है, 10 और 12 वीं के बाद इन शहरों में कोई उच्च दर्जे का कामकाज कभी नहीं मिलेगा, उससे अच्छा गाँव में ही स्वरोजगार अपनाकर भविष्य अपनाना बेहतर है, यहां 10 व 12 वीं वाला बर्तन धोयेगा या आफिस बौय ही बनेगा, ये जो पहाड़ी रिक्रूटर है ये अब एक कमिशन की शिकार भात खाने वाला पहाड़ी है एैंसे रिश्तेदार की बातों में ना आएं चाहे वो तुम्हारा कितना भी खास क्यों न हो, मैं इसको एक ह्यूमन ट्रैफिकिंग की नजर से देखता हूँ, जिसने हजारों पहाडों के युवाओं का भविष्य अंधकार में धकेला है, बहुत कम लड़के ही इनके चंगुल से बाहर आ पाते हैं ज्यादात्तर शर्म के मारे गाँव नहीं जा पाते कि माँ पिता और घर गाँव वाले क्या बोलेंगे, फिर उनके सामने घुट-घुटकर जीने से बेहतर और कुछ नहीं होता.

लेख:- हरदेव नेगी

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