Pitaa ji Bike Dila Do – “पिताजी बाईक दिला दो “

Pitaa ji Bike Dila do - By hardev Negi

Pitaa Ji Bike Dila Do – “पिताजी बाईक दिला दो “

Pitaa Ji Bike Dila Do बात 2013 – 2014 की है जब गढ़वाल यूनिवर्सिटी श्रीनगर में पढ़ता था. पढ़ने के लिए चौरास कैंपस जाना पढ़ता था, और कमरा तिवारी मोहल्ला में था, कभी पैदल तो कभी यूनिवर्सिटी बस के धक्का – मुकि, तो कभी दोस्तों के संग पीछे बैठकर चौरास जाते थे, तब चौरास पुल का काम चल रहा था, उसी संकरे पैदल पुल पर ही बाईक – स्कूटी चलती थी.
दूसरों के पास स्कूटी बाईक देखकर मन करता था कि काश अपने पास भी बाइक या स्कूटी होती तो रोज की ये झंझट खत्म हो जाती. आखिर मैं भी कॉलेज लाईफ में बाईक के मजे लूं।। कब तक दूसरे की बाईक के या स्कूटी के पीछे बैठना पढ़ेगा, सौ बातें हैं बल। गढ़वाली में एक कहावत है कि “आप घोड़ि बाप घोड़ी, बिरंणी घोड़ी कपाळ फ्वोंड़ी”.
अपनी चीज अपनी होती है पराये चीज का कुछ नुकसान हो गया तो कहाँ से भरना” वैंसे भी घर से 5000 रुपये मिलते थे।। इसी में घूमो, पढ़ो, जो करना है करो,।।।
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एक बार पिताजी से सवाल कर दिया कि बाइक या स्कूटी दिलवा दो, पितजी ने सीधे भाषा में जवाब दिया बल ज्ये जमना मा बाईक स्कूटी नि छे तबार कैन किताबें नि पढ़ि.. बल पढ़ना है तो जो मिल रहा है उसी में पढ़ो कोई बाईक – वाईक का चक्कर मत पालो दिमाग में, कुछ तुम बिना बाईक के पढ़ रहे हो कुछ बाईक मिलने के बाद पढ़ोगे, लंख (आवारागरी) लगाओगे श्रीनगर में कभी धारी देवी, कभी पोड़ी खिर्सू दगड़यों कैं साथ.. जैंसे दुनिया के बच्चे जा रहे हैं वैंसे जाओ चौरास तक कोई धूर नहीं है।। इससे ज्यादा तुम ग्वोरू चराने जाते हो छुट्टि के दिनों।। पिताजी की बात से मुखड़ी फस्स जरूर हुई पर जिद्द तो थी मन में आखिर कब तक नहीं मानेंगे।।

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एक बार पिताजी औफिस के काम से ऋषिकेश जा रखे थे, तो पिताजी को फिर से याद दिला दी, Pitaa Ji Bike Dila Do पिताजी बाईक दिला दो।। श्रीनगर में भी मिल जाती है हर कंपनी की बाइक, पिताजी ने हां कहा और बोले ऋषिकेश से आने दे, चार पांच दिन बाद पिताजी औफिस के काम से घर वापस आ रहे थे, पिताजी ने फोन किया कहां है अभी मैं यहां यूनिवर्सिटी गेट पर बाईक सोरूम में बैठा हूँ। मैने कहा मैं चौरास कैंपस हूँ आप वहीं पर रुको मैं अभी आ रहा हूँ।। आधे घंटे बाद जब मैं यूनिवर्सिटी गेट पहुँचा तो पिताजी एक नयी अपाचै बाईक के पास बैठे थे, और कंधे में “वो काला बैग लटका रखा था जिस पर चार पांच जेब होती हैं, और जिस बैग को गाँव में पिताजी द्वारा मेहमानदारी के लिए उपयोग में लाया जाता है या पिर जब कोई पिता अपनी बेटी को मायके बुलाने या ससुराल भेजने जाते हैं तब यहा काला बैग जरूर साथ में रखते हैं।। सेवा सौंळी के बाद पिताजी ने कहा कि मैने तेरे लिए बाईक खरीद ली है, और बाईक काफी अच्छी है, तू इस बाईक को कहीं भी चला सकता है, त्यौल (तेल) भी नहीं फूकती है, टैर (टायर) भी पंचर नहीं होता एैंसी बाईक है, मैने कहा क्यों मजाक कर रहे हो सही बताओ ना कौन सी बाईक ली है आपने?
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पिताजी ने अपने उस काले बैग की चैन खोली और “उसमें से एक प्लास्टिक वाली बाईक निकाली और मेरे हाथ में थमा दी” और बोले पहले तू इस पर हाथ साफ कर, और जब भी फ्री टाईम होगा चला लेना,ना कहीं ठुकने का डर ना तेल का खर्चा, ना तू इस बाइक से बिगड़ेगा” और हां जब तेरा हाथ इस बाईक पर फिट हो जायेगा तुझे इससे भी अच्छी वाली बाईक दिलाऊंगा. मैने कहा तब क्या बैटरी व रिमोट वाली बाईक दिलाओगे. मेरा चेहरा देखने लायक था “ना हंस पा रहा था ना रो” बेइज्जती का इससे बड़ा तौहफा शायद किसी कि जिंदगी में किसी को मिला हो।। पिताजी को ये भी नहीं बोल सकता था कि “अपना टाइम आयेगा” 😎😆 यहां पिताजी खेल गये।
फिर पिताजी ने कहा। फटाफट कमरे पर जा मेरे लिए च्या व चौंसा भात बना, चार पाँच दिन से होटल में खाना खा रहा हूँ “खाणों खादू नि लगि”
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और कुछ साल बाद ये जो बुलट आपको दिख रही है ये मैने अपने दम पर ली।।😎😎😎🤣😂🤣

लेख :- हरदेव नेगी

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