Dear स्वांणी नथुली

Pahadi Lekh,

Dear स्वांणी नथुली जब पैरदि त्वेथैं ब्यटुली. अहा! कन्न हलकदि स्या नकुण्यों मा। जब जांदी बेटी ब्वारी अर माँ जी थौला म्याल्या मा……………. या नथुली सुद्धि एक स्वोना कु गौंणू नि चा। ना कै स्वनार की पछांण चा। यत् उत्तराखंड की संस्कृती चा। धरोहर चा। पूर्वजू कि दिनी समौण चा। नौ बैंणी नन्दा का मैत कू मान चा। और गंगा जी कु सम्मान चा। या नाथुली बाबा जी की आस चा त्, ब्वे कु नाक चा। या नथुली दादा दादी कु दिन्यू संस्कार चा। या नथुली भै बंदौं की राखी चा. या नथुली हमरी दीदी भुलि। काकी। बौडी। ब्वे। दादी। की मुखड़े अन्वार चा.  ई नथुलि बणोंण मा स्वोना का गुंण कम ब्वे बाबा कु खून ज्यादा चा. किलै कि या नाथुली खिल्यां पुंगणों की सार बटी बणांई चा त। डांडा बटि पीठी मा ल्यायां घास कु भारू चा। या नथुली हौल की लाट चा त। या नथुली खुशी को बार त्यौहार चा. जीं डेलि या म्वोर संगार मा या नथुली हलकदि वे घौर मा सदानी भला दिनू की बरखा बरखदि।।।
किलै की या चा पहाड़ की नथुली। सभ्यूं कि दुलारी। लड्या नथुली।

स्वांणी नथुली भी हो पर  कतगा स्वांणी हो

क्वी रूप की गुणवान हो या फिर सौंली सपाटि सी बांद हो। चै आंख्यू मा काजल कु घेरू हो या सिरा कु सिसपूल। या हाथों मा चांदी का नगुला ह्वोन् या खुठ्यों मा झंवरी छम्मणांदी हो। या त् मुखणा मा लाली लगी हो। बिना नथुली पैरेंया यु सभि रंगो श्रृंगार फीकू चा। पहाढ़े बेटि ब्वार्यूं का सोला श्रृंगार भी बिना नथुली का कभि पूरा नि होन्दा । ब्यो कु मंगल स्नान हो। हल्दी हाथ हो। मौल्या थौला हो। स्कूल्या दिनू का सि गढ़वाली कुमौउनी नाटक हो। या नथुली सबि जगा नकुणि मा चमलांदी या बिसार लांदी. गद गदि गल्वाणी और हिवालीं जसि दत्युण्यों का अग्वाणि अर् बुरांसा फूल जन्न् ओठुण्यों का बीच ईं नथुली कु अजब गजब रूप होंदु। कै रंगा भौंरा रगर्यांदा ईंका पैथर। कै मनख्यूं का जिकुणा घैल ह्वोंदा ईंका एैथर। पर या नथुली सुद्धि कै पर बौल नि लांदी. जै घौर मा ध्यांण्यूं कु सम्मान होंदु या नथुली वै ही घौर मा पराज लांदी सेवा सौंली लांदी। ईं नथुली ना क्वी जात चा ना क्वी पात चा। ईं कु अपणु सांखा कु उत्तराखंड चा। जैंका पैथर सैलु गण कुमौ सज्यूं धज्यूं चा, तबैत जब या नथुलि चा तब तु भी स्वांणी चा। अर् त्यारा भाग मा नथुली नी त्, तु कथगा भी बांदू मा कि बांद हो ईं नथुली बगैर त्यारू रगं रूप सैरु फीकू चा।

नथुली त्येरी पीढ़ा!

नथुली त्येरी पीढ़ा कैथें लगदी ह्वेलि त् सबसे ज्यादा बार सजीली नकुणी थैं लगदि. तु नि जंणदि कि तु नकुणी की जिकुड़ी चा। लड्या चा। सांखी चा। त्वै बगैर स्या नकुणी खूब रुणांदी अर् त्येरी पीढ़ा अपणी सुंणाकन् बिगांदी. जनि क्वी बार त्यौहार औंन्दू, ती नकुणि थैं त्येरि खुद लगदि अर् खूब खुतग्यालि लांदी, तु बडुलि भी यन्न् कि जबार तलक तु नाक थैं नि भ्यौंट्दि त्येरि खुद जांदी नी. पर तू भी त् कम नि पिथौंदी कम नि झुरौंदी ती स्वांणी मुखड़ी थैं। त्वे बिगर छाया भी पड़ जांदी आंख्यू मां. पर सच्चि बथौं त् त्येरि पिड़ा नाक ही जांण, अर् त्येरू सग्वोर सुनार ही पछांणद्. कि तु कैका लैख चा अर् कैका ना. ब्वे बाबा त् खाली त्वै सैंतदा छन्न या पालि प्वोसदा छन्न। तु त् तौंका खैरी का दिनू की आस चा। तु त् दान दहेज की पीढ़ा चा, त्वै नथुली का बाना तौन क्या दिन नि देख्या क्या सुपिन्या नि पूरैयां। पर तु ब्वे बाबा की लाज चा। सौर्यस मान चा, सम्मान चा।  तु द्वी घौरू कु संगम चा तु सूखी बिज्वाण की सौंण बरखा चा।, तु रूखा डाल्यों कु बसंत चा।  त्यारा डौला तैं ऊठौणं वाला भैं बन्धों कु रुठणुं मनाणुं चा। तु गैल्या दगणुं कु सारु चा। तु स्वामी जी का सात फेरों कि जगदी दिवा चा। तु नणद् भौजू की ठठा मजाक चा। तु भ्येना स्याली की मजाक चा। तु सासु सी जिदेर चा। पर तु क्या कै नि चा नथुली. अब तु ही स्वोच् जब इथगा लोगू की तु जांणिं पच्छांणी चा त् तू ही बतौ त्येरी पिढ़ा कति ह्वेली। कति आंसू ह्वाला त्यारा बिगर बगणां। पर तु अपणी पिढ़ा लुकै ना ढकै ना। जब भी तु पीढ़ाली त्वे बिगर या घर कुढ़ि गौं गुठ्यार सुनि ह्वे जालि। तु जक्क भी रौ राजि रौ सुखि रौ. स्वांणि नथुली त्येरी पिढ़ा नाक ही जांण।

आखिरकार या नथुली छौ पर छौ कैकी

बल् आखिरकार या नथुली छौ पर छौ कैकी। टिहरी की ह्वेली या पौड़ी की। चमोली की ह्वोलि या बागेश्वर की। अलमोड़े ह्वेली या देरादूंण ह्वेली। उत्तकाशी ह्वेलि कि चम्पावतै ह्वेलि। नैनीतालै ह्वेलि या रुद्रप्रयागे। या फिर पिथौरागढ़े. पंच प्रयागे ह्वेली या चार धामे। हरि का हरिद्वारे ह्वेलि या हिंवाला कांठें ह्वेलि. नौ बैंणी आंछिरी की ह्वेलि या धार मगा बुरांसे। सार्यूं बीच फ्योंलि ह्वेलि या शिव का कैलाशा कौंला फूल की।
पर मि ब्वोदू या नथुली कैकी नी. ना स्वोना की। ना सुनार की। ना ब्वे बाबू ना सौर्यासे। या नथुली नाके चा। जथगा स्वांणि नकुणि। तथगा स्वांणि नथुली. किलै कि जथगा स्वांणू नथुलि कु रंग, तथगा स्वांणू उत्तराखंड. जब या नथुली चा तबै हमरि एक अलग पच्छांण चा। हमरा पहाड़ मा स्वोना खान नि छन्न पर हमरा पहाड़ मा नथुली का पैरवाक् छ्न्न। अर् ईं नथुली का अलग अलग रंग ढंग छन्न्.   

लेख – हरदेव नेगी।
 पहलकर्ता – Pahadi Blogger

7 thoughts on “Dear स्वांणी नथुली”

  1. प्रबोध डिमरी

    आनन्द ऐगे भैजी।
    बहुत सुन्दर रचना
    शुभकामना एवं बधाई

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