मेरा गाँव – पहाड़ी लेख

Mera Goan - Pahadi Lekh,
कुछ अच्छी कविताओं में
पढ़ा है मैंने अपना गांव भी

गाँव शब्द में ही हजारों हजार फीलिंग्स छिपी होती हैं वो हरियाली हवा पानी संस्कृति सभ्यता और प्रकृति का सुंदर संगम होता है एक आदर्श गांव। मेरा गांव जहां हर ऋतु अलग अलग फलों फूलों फसलों की सौगात देती है चाहे आम हो काफल हो पपीता नारंगी सन्तरा अनार अमरूद अखरोट भी खूब होते हैं !!!! फसलें ,दालें सब्जियां हर ऋतु में अलग अलग जलवायु अनुसार होती हैं !!! मैं बात कर रहीं हूँ अपने गांव चमोली के पोखरी ब्लॉक के साकनी गढ़खेत की जो 2019 में भी बिल्कुल 1999 की तरह जी रहा है !!!! हो सकता है संस्कृति और सभ्यता की दृष्टि से काफी आगे चला गया हो लेकिन कुछ असुविधाएं आज भी जस की तस हैं। हाँ ये जरूर हुआ है विभिन्न असुविधाओं के होते गाँव विलुप्ति के कगार पे है , आज वही लोग गांव में है जिनकी आर्थिक स्थिति कमजोर है और या तो कुछ वृद्ध लोग।

अब हमें कहा जाता है पलायन रोको शहरों में मत जाओ, गांव का उच्चीकरण करो गाँवों को जिंदा रखो….. बात तो सही है पर आधुनिक युवा रहेगा कैसे ?? जहाँ के पैदल रास्ते भी रास्ते नहीं रहे …सिर्फ टूटे फूटे बट्टे हैं, जिनमे बड़ी मुश्किलो से जाना पड़ता है । ठीक टाइम पे यदि कोई बहुत बीमार हो जाता तो उसका अंतिम इलाज मरना है!!! प्राकृतिक सम्पदाओं की कोई कमी नहीं है पर वो चीजें किस काम की जिनका संरक्षण नहीं है जिनका संवर्धन नहीं है जिनका अपने स्तर पे विकास नहीं है। पानी के बहुत प्राकृतिक स्रोत हैं इतने कि एक शहर की आबादी को पूरा पानी मिल जाय , पर क्या करे अब धारों पर तिमले के पत्ते लगा के तो हमेशा पानी पिया नहीं जाएगा न…. पानी तो ढंग से संरक्षित होना जरूरी है, और इन सब जरूरतों के लिए हम हर 5 साल में कुछ लोगों को चुनते है ताकि वो हमारी जरूरतों को सुने आगे ले जाएं और हमारी मदद करें पर कख सबको अपनी ही लगी है यहां तो।

Mera Goan by Neelam Rawat,

कृषि युक्त भूमि ऐसी की यहां के युवाओं को कुछ और करने की जरूरत ही नहीं पर क्या उन खेतों की सिचाई के लिए सिचाईं नहर और अन्य संसाधन ही नहीं लोगों ने वैसे तो व्यक्तिगत तरीको से बहुत हद तक काम चलाया है लेकिन यदि थोड़ा और सुविधाओं में सुधार आता तो सभी का भला होता।  अब अगर खेतों में सब्जी दालें अनाज उग भी जाये जंगली जानवरों पक्षियों से बच भी जाये उसे बेचने के लिए बाजार तक लाएं पर लाएं कैसे इतना लंबा रास्ता चढ़ाई से तो जितना कमाया नहीं जाएगा जितना दवे दारू पे लग जायेगा और तो और सिर्फ एक माचिस की तीली खत्म हो जाये तो उसके लिए भी दो चार किमी पैदल चलना पड़ता है !!!

बात ये नहीं कि वहां मोटर रोड जा ही नहीं सकती अरे मेरे देखते देखते साढ़े सात बार की survey हो गयी लेकिन अभी तक क्वि आसार नहीं है।। गाँव वाले इस सांत्वना पर हैं कि इबार दी त ऐगे मोटर रोड पर उ इबारी कबारी औलू यू पता नि च??? अब कै मा लगणि अपरि बिपदा, नेता त सिर्फ चुनो का टेम पर हाथ जोड़ते हैं बसकयायी मिंढका जन छुटदा झूठा वादा करीक ते बड़ो बेवकूफ बड़े जन्द।। बाकी अगर कभी बात छेड़ो भी तो इग्नोर कर देते हैं पट ।। और तो और विगत कुछ वर्षों से हाल ये हैं कि जो गदेरों में पुल नहीं है जिससे बरसात के समय लोगों की आवाजाही की परेशानी बढ़ जाती है ।बरसात में जो टूट फुट होती उसकी भरपाई नहीं होती इस प्रकार अनेकोनेक दिक्कतों से जूझता विलुप्ति के कगार पे है मेरा गाँव।।  

लेख: –    नीलम रावत

4 thoughts on “मेरा गाँव – पहाड़ी लेख”

  1. हर गांव का यही दर्द है, हर गांव की कहानी एक सी है,कहीं रोड नहीं है तो जहां रोड पहुंच गई वहां लोग नहीं रहे,पलायन कर शहरों, कस्बों में जा बसे और जाएं भी क्यों ना, सभी को अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा, अच्छा स्वास्थ्य सभी सुविधाओं की चाह है, अब गांव खंडहरों में तब्दील होते जा रहे हैं और कोई कुछ नहीं कर सकता,जो गांव में है वो वक्त की बाट जोह रहे हैं ।

  2. हर गांव का यही दर्द है, हर गांव की कहानी एक सी है,कहीं रोड नहीं है तो जहां रोड पहुंच गई वहां लोग नहीं रहे,पलायन कर शहरों, कस्बों में जा बसे और जाएं भी क्यों ना, सभी को अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा, अच्छा स्वास्थ्य सभी सुविधाओं की चाह है, अब गांव खंडहरों में तब्दील होते जा रहे हैं और कोई कुछ नहीं कर सकता,जो गांव में है वो वक्त की बाट जोह रहे हैं कि शायद कुछ चमत्कार हो पर अब ये संभव नहीं,गांव वाले शहर जाएंगे और शहर वाले कभी गांव नहीं बसेंगे।

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