बीर बाला – तीलू रौतेली

 



veer bala teelu rauteli

वीरांगना को जनम मास  –

तीलू कु जनम कबार ह्वे ये कि अजौं तलक कै भी पतुड़ा मा सच्च नी चा ना लेख्यूं चा, फिर भी इतिहास का जनकार अर लेखक ब्वोदा की तीलू कु जलम 8 अगस्त 1661 मा ह्वे छौ. पर या बात पक्कि चा कि तीलू कु जलम पौड़ी गढ़वाल का कांडा मल्ला गौं मा ह्वे छो, जक्ख तीलून् अपणु बालि ज्वनि बिताई. तीलू तैं जलम दैंण वलि ब्वे कु नौ ‘मैंणावती” छो, अर् बुबा जी कु नौ भूप सिंह रावत छो. तीलू का अग्वाड़ी द्वी भै छा जौं कु नौं छा “भग्तू अर् पथ्वा” अर् पिताजी “गढवाल नरेश” “राजा मानशाही” का जु सेनापति छा “गोगू / गौर्ला” “महाराजा फतेशाह” की सेना का सिपै छा. ऊं दिनु सेरा गढ़वाल मा “कन्त्यूरों” कु अत्याचार भेद भौ, लूट खसोट्, मचायूं छो. अर् सेरा गढवाल का गौं मवासों मा निराणूं निखांणू छों ऊंकु कर्यूं। पर बालापन्न मा तीलू अपणी गैल्या दगड़यों,ब्वे, गौं गौलों मा हेसंण खेलणं मा बिताई. जिया की लाडी तीलू सभ्यूं मा छोटि छैत् लाड प्यार भी ब्वे बाबा अर् भैंयू कु भी खूब छो, ऊं दिनु मेल्या थौंलों कु भि खूब रस्यांण बाला मन्न मा रौंदी छे। अर् तीलू भि खूब सोक्यांण छे. गौं कि बाड़ी सग्वाड़ी गाजी पाती घौर बौंण या खेला ख्यालि तैं तीलू भी ज्वान ह्वेगि जे अर् पंदरों बरस लगी छों वींथैं. जु कि तैं जमना हिसाब से तीलू ज्वान ह्वेगि छें, तीलू दिन दुनिया का रौ ठौ भी थौड़ा भौत समझंण लैगि छें। पर् तीलू थैं अपणु औंण वाला बरसूं की जरा सि भि ढौर भैं निछें। अर् स्या अपणा दगड्यूं का गैल मा खुश छे। 

तीलू की पेट पिठैं –

तीलू की जनि उमर पंदरा साल कि ह्वे त् तीलू का घौर मा वींका पेट पिठैं की बात होंण बैठी छैई, पर तीलू अपणी ब्वे बुबा सी ईं बात पर रुसाईं छै कि ये बालापन्न मा अभि मि ब्यो का लैख नि छौं. पर वींकी कतै नि चली। अर् वीकीं मांगण “इडा गौं पट्टी मोंदाडस्यूं” भुप्पा सिंह नेगी का पुत्र “भवानी सिंह नेगी” का दगड़ा ह्वे, जु गढवाल नरेश की सेना मा सैनिक छौ. तीलू की मांगण होंण से ब्वे बाबा जी भी खाफी खुश ह्वेगी छा. ऊं दिनू गौं गौलों मा पंदरा साल की उमर भी ज्यादा बड़ि ह्वेंदी छे. यैका पैथर शिक्षा कु अभाव छौ, अर् द्वोसरा मा ब्वे बाबा भी अपणी नौन्यूं का ब्यो कि भारी पिथैं हौंदी छेई. पर तीलू कर भी क्या सकदी छे पुरांणा रीति रिवाज का अग्वाड़ी वीन भी अपणी घौरा का मान सम्मान का खातिर वीन अपणु जीवन ब्यो थैं समै दीना अर् ब्वे बाबा जी कु बोल्यूं कर दीने. पर वींका ये संजोग पर कन्त्यूंरो कु काल बास ह्वेगी छो अर् दिनो दिन गढ़वाल मा हो हल्ला अत्याचार हौंण बैठी छो. अर् आखिर मा गढ़वाल का “राजा मानशाही” थैं युद्ध को आदेश देंण पढ़ि.

बाबा जी, भैजी अर् कु बलिदान –

तीलू की पीठें रच्योंणा का बाद जनि गढ़वाल नरेश कु आदेश कन्त्येरों दगड़ी होई. उनि सेनापति महाराजा फतेशाह अपणी रंण बांकुरों की सेना सजौंदू, कन्त्यूरों का दगड़ा युद्ध मा तीलू का बुबा जी कु बलिदान ह्वे अर तौन अपणू सर्वोच्च बलिदान गढवाल की रक्षा का खातिर निभै दिनी. जनि तीलू का बाबा जी का बलिदान की बात तीलू की ब्वे मैंणावती न् सूंणे त् ऊंका खुटूं बटि जमीन खिसकण लैग्यें. अर् अपणा क्रोध का रूप का अग्वाड़ी अर् दुधा सो उमाल जब आंख्यूं बटि चूंण लैग्ये त् ब्वेन अपणा सुहाग कु बदला ल्यूंणा खातिर अपणा द्वी नौना “भग्तू अर् पथ्वा” तैं भी युद्ध को आदेश दीने. अर् द्वी भै भी तलावर कसीक् थैं कन्त्यूरों का दगणा लणै मा जैगेनी. अर् ये युद्ध मा तीलू कु मंगेतर भवानी सिंह भी अपणा गढ़ का रक्षा की खातिर लणै मा पैटी. पर ये युद्ध मा तीलू का द्वी भै अर् मंगेतर भी कन्त्यूरों का समणि अपणा प्राणों थैं त्याग दे ग्येनी. यी बात सूंणीक तीलू अर् तीलू की ब्वे द्वी का द्वी होश हबास ख्वे ग्येनि. अपणा सुहाग, नौना अर् बेटी का जवैं ख्वोंण से मैणावती तीलू थैं अपणा सांखा पर भ्योंट्दि अर् आंसू का पंणधारन् पुरू गात रिझौंन्दी. पर कुछ दिन स्वोच विचार करीक् थैं तीलू की ब्वे भी अपणा मन्न तैं बुझौंण लैगी छै. पर आंख्यू अर् जिकुणा मा आपणों की पीड़ा मेणावती थैं दिन रात स्योंण नि दैंन्दी छै. अर् बार बार शत्रु का संहार की ज्वाला मा भबकांदी छै. अर् स्वोचदी छै कि क्वो करूलौ कन्त्यूरों को विनाश. कब खत्योलू सुख को घाम. या सदानि इनि दुख का घंणा बादल मंडरांणा राला. ई पीढा से मैणावती होर भी ज्यादा चुलखांदे आग सी तपड़ लैगी छै। भबरांण लैगी छै.

तीलू कु म्येला जांणै जिद्द

मौल्या थौलों की बार औंण बैठी छै तीलू कु मौन भी कबंलाण लैगी छों अर् अपणी गैल्याणों दगड़ि मौल्या जांण थैं अपड़ा ब्वे संणि पूछदी कि ब्वे मि भी जांणू मौल्या मां, इथगा सुंण बार तीलू की ब्वे मैणावती तीलू पर काल ह्वेगी अर् ब्वन्न बैठी कि हे तीलू त्वैकु कुछ लाज सरम छौ कि ना, त्यारा बाबा जी, त्यारा द्वी भै, अर् त्यारू हौंण वालु सुहाग कन्त्यूरों युद्ध मा मार दैनि अर् तु मौल्या जांण कु मन्न छा कनि. तीलू त्वेथैं सौं छन्न म्यारा दूध का। त्वेथैं सौं छन्न अपणा बाबा जी का मान सम्मान का। छौड़ थौल जांण ल्ये पकड़ ईं तलवार थैं अर् कर कन्त्यूरों कु विनाश. ब्वे की बात तीलू का जिकुड़ा पर लैगी अर् ब्वे का वचन निभौणां खातिर तीलू अपणा बाबा जी की तलवार ऊंठौदी अर् सौ खांदि कि जबरी तलक मैं ईं गढ़ भूमि थैं कन्त्यूरों का मुखै पटि जीती क् नि औन्दू तब तलक् मैं ईं नयार घाटी लौटीक् नि ओलू. अर् पंदरा साल की बालि उमर मा तीलू लड़ै कन्ना कु अपणी कुंगली जिकुड़ी थैं बैख जन्न सांखा सी तपौंदी. तीलू थैं घुड़सवारी व तलवार चलौंण सेनापति “शिबू पोखरियाल” सिंखोदू। अर् तीलू की गैल्या “देवली अर् बेल्लु” भी दगड़ा मा तलवार बाजी सीखदन. तीलू की घोड़ी कु नौ “बिंदुली” छौ. सेनापति पोखरियाल सच्चि गुरु दक्षिणा से तीलू लड़ै का लैक ह्वेगी अर् अपड़ी घोड़ी सजैक् अर् सेना का दगड़ा मा तीलू कन्त्यूरों का दगड़ा लडै क् पैट जांदी. 

कन्त्यूंरो कु विनाश –

तीलू कु विजै रंण जब खैरागढ़ पौंछुदु त् तीलून् खैरागाढ़ मा कन्त्यूरों कु नाश करि अर् खैरागढ़ जेथैं हम आज “कालागढ़” भी ब्वोलदा वा जगा कन्त्यूरों का अत्याचार  से हमेशा कु मिटौ ह्वे. फिर तीलू अपढ़ी गैल्या। सेना व हुड़का की ताल पर उमटागढ़ की दिशा मा अग्वाड़ी जांदी अर् वक्ख् भी तीलू की जै विजै होंदी. वैंका बाद तीलू अपढ़ा क्रोध की ज्वाला जन्न जिकुड़ी सरील् लीक तैं “सल्ड मादेव” पौंछदि जक्ख वीन् दुराचारी राज रज्वाणों कु चीर फाड़ करि  विजै हासिल करि। फिर तीलून् चौखुटिया छ्वोड़ तक् गढ़ राज्य की सीमा बंणोंणा का बाद तीलू अपढ़ा वीर सैना का दगड़ी “देघाट” वापस पौंछि. वैका बाद तीलू कु दुश्मनू दगढ़ी कलिंका खाल मा घोर युद्ध ह्वे वक्ख् भी बैरयों का ल्वे का घट्ट रिंगै दीनी. “सराईखेत” मा तीलू कन्त्यूरों कु नाश करिक् अपणा बाबा जी का बलिदान कु न्यो निसाब पूरू करि, यक्खि तीलू की घोड़ी “बिंदुली” लड़ै मा घैल ह्वोंणा बाद स्या भी तीलू कु गैलू छ्वोंड़ी ग्ये. अर् कन्त्यूरों कु नाश करिक् तीलू नयार गंगा पैटीदि.

गंगा स्नान अर् तीलू को बलिदान –

सात वर्ष अर् आठ मैना का घौर लड़ै मा तीलू कु गात दुराचार्यूं का खून से लतपत हुंय्यूं छौ. तीलू जब कन्त्यूरों कु नाश करिक् अपढ़ा गौं पैटिदी वैका बाद बाटा मा नयार नदी मा तीलू गंगा स्नान् कु ज्यू करदू. अर् तीलू जनि गंगा स्नान कु जांदी त् पिछवाड़ी बटि घात लगै कि बैठ्यू कन्त्यूरों कु सेना कु सैनिक “रामू रजवार” तीलू पर तलवार से हमला कर देन्दू, अर् तीलू का प्राणं हर लेन्दू. अर् तीलू अपणु अमर बलिदान गढ़ की रक्षा व सेवा की खातिर त्याग देंदी. अर् बाईस साले ज्वानी मा तीलू अमर ह्वे जांदी. गढ़वाल का इतिहास व पूरा भारत वर्ष मा तीलू कु बलिदान सर्वोच्च बलिदान आज भी स्वर्ण आखरू मि लिख्यूं चा। आज भी तीलू का नौ से बीरोखांल का कांडा गौ मा कौथिग लगदू, अर् पूरा न्यो निशाण भांणा भांकुरा लैकि तीलू की पुजै होंदी. 

लेख – हरदेव नेगी @Pahadi blogger

1 thought on “बीर बाला – तीलू रौतेली”

  1. अद्भुत,,,आप जैसे चंद लोग ही गढ़वाली भाषा और संस्कृति को बचाये हुए हो ,,,हाँ उन लोगो की बातों पर कभी ध्यान ही नहीं देना चाहिए जो हतोत्साहित करते हो ,,,पढ़ने वाले गंभीर और अच्छे लोग ही भले जो समझ सकें कि आखिर लिखने वाले के भाव क्या है ,,

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