कुछ एैंसी है गुप्तकाशी

सूरज की पहली किरणों संग,
नयन भिगोते जहाँ के वासी.
नीस जिसके बहती मंन्दाकिनी,
वही नगरी है गुप्तकाशी.

भोले बाबा के जयकारों से,
गूंज उठती है जब केदार काशी.
पांच पांडव हुए श्राप मुक्त जहाँ.
पाते मोक्ष इस धरा के वासी.
कुछ………..गुप्तकाशी.

चौखंम्बा की हिम लहरों से जब,
खिलते बुरांस और बहती मधु मासी.
जाख राजा के जप तप से जब,
ना रहती धरा जहाँ की प्यासी.
कुछ……..गुप्तकाशी

ज्वालामुखी और सिलौंजा माँई,
पार्वती माँ जो सब पीढ़ा हरदासी.
दुख हरती सुख बांटती सबके,
ना रह जाये कोई धियांण उदासी.
कुछ……….गुप्तकाशी.

लेख : हरदेव नेगी

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