कब खुलाली चारी!

लगदे सौंण महीने की म्वोल संगरांती को जंगल के चौकदार ने चार (गांयों के घास घरने वाला चाराग्रह) बंद कर दी थी, बंद करने के दिन ग्वेर छ्वोरों की जिकुड़ी में हलकी सी टीस जरूर हुई थी कि अब रविवार के दिन ग्वोरू कहां चरायेंगे, पर चाराग्रह को बंद करने का उद्देश्य छोटी दीवाली के दिन फिर से खोलने की परंपरा सदियों थी, तो ग्वेर छोरे ज्यादा झीस नहीं होते थे, पूरे सावन व भादों की बारिश से चारागाह में घास फिर से मोलने लगी थी, और असूज तक घास तीन चार फुट तक हो गई थी, एक तरफ जैंसे-जैंसे साटी के पकने की खुशबू सरियों से चौदीस फैलने लगी चारागाह की चार भी पकने लगी और और फिर से ग्वेर छ्वोरों की मुखड़ी खिलने लगी और बस उनके दिलों दिमाग मे चारगाह खुलने की उल्टी गिनती शुरू होने लगी, जैंसे कार्तिक महीना आया और छोटी बग्वाल कब आयेगी ग्वैर छवोरों का कौतूहल एैंसे अठखेलियाँ करने लगा जैंसे दूध पिलाते वक्त गाय बछड़ा अठखेलियाँ खेलता है,……………………….

उधर साटियों की लवै मंडवार्ती खत्म हो गई थी तो घर ख्वोलों में चूड़ा बुखड़ा कूटने के लिए बेटी ब्वारीयों व सासू ने साटी को एक पतीले में भिगोने के लिए रख दिया, कि जो भी गौं कि दिसा ध्यांण व मेहमान आयेंगे उनके झोले में एक एक कुटरी दे देने का रिवाज आज भी हमारे गाँव में हैं, उरख्यालों में चूड़ियों का छमड़ाट और गंजाल्यों की घमाक हर तरफ सुनाई दे रही है, अहा कन्न रंगत वाली बग्वाल आई है बल, छोटी बग्वाल एक दिन पहले चौकीदार ने सुलकारी मार दी थी और गौं की धार से जोर भट्याना शुरु कर दिया कि बल “कल से चार खुलेगी बल” बग्वाल्यों की छुट्टियाँ भी पड़ चुकि थी, रात और लंबी होती जा रही थी मासूम ग्वैर छ्वोरों की ये रात भी बड़ी इंतजार वाली होती थी मानो कि इससे बड़ा प्रेम जिंदगी में किसी और के लिए नहीं होगा,………….!…….

सुबह जैंसे ही रात खुलि और डांड्यों का घाम गौं की तरफ सरकने लगा, अधोया मुख (बिना हाथ मुह धोने) और बिना च्या पांणी के ही गौं के मासूम ग्वेर छ्वोरो ने अपने अपने दादा दादी माँ पिता से कहा कि जल्दी बल्दू ग्वोरू और छोटी थ्वैरी का किलै से सांगल निकालो और हमारे हाथों में एक स्येटकी दी बल चार धार में ग्वोरू चराने जाना है बल, उधर माँताओं और दादीयों ने अपने अपने बच्चों और नातियों की जेबों में बुखड़े तिल खिल बतासे व अखरोट की दांणी भर के रख दी थी, और ग्वोरूओं को ढंग से देखने व सब्योर घर लाने को कहा, उधर माँताओं व दादियों ने बैलों की पूजा के लिए फूलों की माला व नये नाज झंगोरे का पींडा बना रखा था जो कि 11 बजे घर लाने के बाद पूजा करके खिलाना था,……………,………..
जैंसे ही चारधार में ग्वोरूं बैल थ्वैरी (भैंस का बच्चा) पहुँचें तो उनका भी खुशी का ठिकाना न रहा कुछ अपने सींग मिट्टी से खुजाने लगे तो कुछ बैल खाफी दिन बाद मिले तो एक दूसरे को देखकरे कर अढ़ाने लगे, कुछ भारी लड़ाकू जिनके कि सिंग टूटने का डर, कुछ भलि म्येस के साथ घास चरने लगे, वही भैंस सबसे मैलुक जानवर होता है जो अपने ग्वोसी के पद चिन्हों पर चलने लगते हैं मतलब अगर भैंस की ग्वोसी रुकेगी तो भैंस भी रुकेगा अगर चलेगी तो भैंस भी चलैगा, अगर ग्वोसी किसी पेड़ के पीछे छुपता है तो भैंस अड़ाने लगती है, अहा कन्न हौंस उलार वाली बग्वाल और चारधार खुलने की परंपरा है मेरे गाँव सांकरी में, कुछ बच्चे जो शहरों में रहते हैं और बग्वालों के लिए गाँव आये हैं उनकी चेहरे की खुशी और आजादी दोनों वो महसूस कर रहें हैं दिन भर पके म्वोल खाना, पेड़ों पर दस बीस खेलना, एक लकड़ी का पट्टा लेकर रड़ाघुसी खेलना आजकल मानो किसी ओलंपिक से कम माहौल गाँव की चारागाह में बना पड़ा है, यहाँ कोई मेडल तो नहीं मिलेगा पर जो खुशी मासूम चेहरों पर मिलेगी वो देखने लायक होती हैं, किसी ने चुपके से चारागाह के बीच बीच व किनारे का घास चोरी करके काटा है तो कुछ दादी व ब्वारीयां एैंसे घास चोरों का नटि सटि गालियां देकर चपट कर रही हैं, बुजुर्ग व ज्वान दगड़यों का तास खेलने का समय भी आ गया है, दूसरी तरफ दो चार बुड्या मनख्यों ने व निरभगि सीसी भी ले जा रखी थी और बांज के पेड़ के नीचे चुपके चुपके अमृत रस की चुसकिया ले रहे थे. और अगले एक दो सप्ताह यह हौंस ऊलार मेरे गाँव की चारधार में देखने को मिलेगा.

लेख बग्वालों की समलौंण

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