जनहित में जारी

देहरादून, दिल्ली, हल्द्वानी, और हरिद्वार जैंसे शहरों में रहने वाले, पहाड़ी कुबुद्धीजीवी पत्रकार, गायक, व गीतकार वर्ग कृपया ये बताओ कि पहाड़ की बेटी-ब्वारियों की जिंदगी को पीड़ादायक व कष्टदायक बताकर तुम क्या सिद्ध करना चाहते हो, पहाड़ की बेटी ब्वारिंयों की जिंदगी तुम्हारी बेटी ब्वारियों की जिंदगी से लाख गुना बेहतर है, वो संघर्षों से लड़ती है और उनका डटकर मुकाबला करती है, वो तुम्हारी बेटी ब्वारियों की तरह किटी पार्टी व कमेटी बनाकर टाईम पास नहीं करती वो एक धरा को सींचती है और पहाडों को हरा भरा रखती है, अगर पहाड़ का पुरूष अपने हाथ पाखुंड़ों के बल पर खेतों के मेंडों को चीरता हुआ शिव है तो पहाड़ की बेटी ब्वारी उन खेतों में अन्न उगाती हुई एक पार्वती है………!……………….

वो नाज के कुठार भरना जानती है, तुम्हारी बेटी- ब्वारीयों की तरह बिग बाजार से सस्ता सामान खरीदने का इंतजार नहीं करती, वो जिंदगी जीना सिखाती है वो तुम्हारी तरह नहीं है कि आज किस पार्क में घूमकर टाईम पास किया जाए, वो तुम्हारी तरह अपने बेटे बेटियों को स्कूटी चलाना नहीं सिखाती बल्कि उनको गंजाले की मुट कैंसी पकड़नी है, और फाट पर हल कैंसे जोतना है, जैंसे जिंदगी जीने और संघर्ष की भाषा सिखाती है. उसके बेटे, बेटियाँ आज हर क्षेत्र में आगे हैं तुम्हारे बेटे बेटियों की तरह नहीं जो ना घर के हैं ना घाट के. वो तुम्हारी तरह बीस रूपये की पनीर नहीं खरीदती वो छांछ छोलना जानती है. भले उसमें अंग्रेजी में छिफली गिच्ची करने का टैलेंट तो नहीं है पर गढ़वाली, कुमाऊनी व जौनसारी भाषा का सग्वोर अच्छे से आता है, अपने पत्रकारिता की कलम में अपने निक्कम्मेपन की स्याही भरें और अपने बारे में लिखें कि हमेशा के लिए गाँव छोड़कर तुमने कि तुम कितने सुखी हो, अपने गीतों की कुभौंण व सुर ताल में अपनी जिंदगी में होने वाले तमाशों को लय व छंद दे.

“और एक बात और पहाड़ो पर जिंदगी टैलेंट से नहीं बल्कि सग्वोर के दम पर जी जाती है”.

जनहित में जारी, सच्चाई लिखना आदत है मेरी.
पहाड़ी ब्लौगर
हरदेव नेगी

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *