इसरो या इस “रो” में

जब इंटर कॉलेज में पढ़ता था, तब गुरुजी कहते थे, “इसरो” में बैठा कर, अक्सर जिसरो में बैठता था गुरुजी उनको बहुत कूटते थे पर “उसरो” में जो बैठने का मजा था, वो “इसरो” में नहीं था, क्योंकि “इसरो” में ज्यादातर बच्चे “वि‍ज्ञान”(Science)  से पीड़ित रहते थे जिन पर टाप आने के प्रेशर रहता था, और उसरो में मांइड फ्री “कला” (Art & Commerce) वाले मस्त टाईमपास वाले बैठते थे. पर गुरुजी बहुत चालक थे तर्कों (Logic) में बात समझाते थे पर इसरो का साफ-साफ मतलब नहीं समझाते थे, हम भी “लाटे” “Innocent” थे तो इसरो का मतलब “पंक्ति” समझते थे, तब इसरो और इस “रो” दोनों एक जैंसे लगते थे.

ना उन दिनो जानने की कोशिश की, इसलिए बार-बार कहते थे “इसरो” में बैठा कर, अगर मवासी (Future) बनाना है तो. उसरो बैठोगे तो कुछ नहीं हो पायेगा, फौजीटीचर के आलाव दूसरा कोई अवसर नहीं है. और अक्सर होता यही है उसरो वाले लड़के ज्यादातर फौजी बन जाते हैं और एक आध मास्टर, “इसरो वालों का तो कहना क्या है सांइस का मसाण उन पर एैंसा लगा रहता था जैंसे अगले आईस्टीन यही निलेंगे, बाद में पता चला “इसरो” वाले देहरादून रुड़की के प्राइवेट इंजीनियरिंग कॉलेज वालों की मवासी बना रहे होते हैं, पर गुरुजी भी कभी ये नहीं समझ पाये थे कि “इसरो” में एक थी जो “इशारों में सनकाती थी और “उसरो” से “इसरो” वाली की आँखो से जल्दी सम्पर्क होता था. पूरे चार साल मेहनत किया सम्पर्क बनाने का पर कभी “इसरो” वाली के दिल में लैंड नहीं कर पाया.

खूब चक्कर लगाये उस औरबिट के पर हमेशा नेटवर्क टूटता रहा, फिर कुछ महीनों बाद पता चला “इसरो” वाली बल फौजी के दिल में लैंड कर गयी. अक्सर यही होता है पहाडों में फौजी व टीचर जल्दी लैंड कर जाते हैं, बाकी सब चक्कर ही लगा पाते हैं लैंड नहीं कर पाते. पर अब फिर से दुबारा सम्पर्क की कोशिश है “इसरो” से. और आज भी इसरो का मतलब मेरे लिए वही है क्योंकि दुनिया में एैंसे भी विषय हैं जो “इसरो” या “उसरो” में भेदभाव नहीं करते. और वो विषय है Business Management.(व्यवसाय प्रबंधन). बिज़नैस मैनेजमैंट “इसरो” या “उसरो” में अतंर नहीं करता, ये सबको एक समान मानता है, कोई किसी भी “रो” में बैठ सकता है, क्योंकि बिजनेस मैनेजमैंट कहता है कि- “Management is an Art or Science”.

 

लेख: – हरदेव नेगी

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *