गढ़वाली कविता “टेक्वा”

Tequaa garhwali kavita,

मेरि जिंदगी कु घाम अच्छलांण लैग्ये।
अंधेर संगती बिंरयूं चा,
उंदार तरीक उकाल छौं जांणू।
अब ये टेक्वा कू सारू चा.

नांगा खुट्यों हिट्यूं मि भी।
चौक उर्ख्याल्या तिबारी मा,
ब्वे मेरि भी मै लठ्योंदी छे।
जब जांदू छौ मि बिरांणी बाड़ी सग्वाड़ी मा,
अब म्यारा मेसि बिरांणा हुंय्या।
अब यु गिच्चु कै धौ लगांदू नि चा,
ऊंदार……………………सारू चा।

जु कांडा कै नि चुभिन।
सि मेरा खुट्यों डूब्यां छां, 
जू बिठा पाखों मा क्वी नि ग्ये छो।
तख् मेरा भि गोरू बखरा चरयां छा,
अब मेरू गोरू मै लत्योंड़ बैठी।
यु मन कै समलौणूं नि चा,
ऊंदार…………….सारू चा।

स्कूलों बाटू म्येरु भी नि छौ देख्यू।
म्यारा बाबो मैं ज्ञान कु बाटू बथायूं छौ,
जौं थैं पढ़ै लिखै मैंन बड़ि बड़ा स्कूलू मा।
तौंका ज्ञान ऐथर  म्येरू ज्ञान फीकूं छौ।
अब या ज्ञान की गंगा सुद्धि कनै बगौंण,
जब सभि ज्ञानि बण्यां छां।
उदांर…………………………… सारु चा।

मौल्या थौला गंयू मि भी।
बाली ज्वानी का रौला धौला मा,
अलझि जिकुड़ु मेरू भि छो बुरांसा फूल पर।
भौंर जन बिरण्युं मि भी बुरांसा फूल पातों मा।
अब सि फूल मेरा गुठ्यार नि खिलड़ा,
फूलदेरू कूड़जी रीति चा।
ऊंदार…………….. सारु चा.

पुगंड़यों का मेंडा मिन भी खोड़ी काटिन।
मौं का मैना झौड़ तौड़ मा,
साट्यूं का कुंडका मिन भी मांडिन।
असूजा तैला घाम मा।
अब यु घाम भी सीलू ह्वेगि।
पूसे आग मीसे तपेंड़ी नि चा।
ऊंदार………………….. सारु चा।

लिख्यूं होंदु भाग्य सबू कु।
बामड़ा बाच्यां पतुड़ा मा,
अरे आज मि भि लौंदू सार।
अपड़ा सैंत्या पुंगड़ा मा,
अब यि पुंगड़ भी बांजा पड़या।
हौल् नाज युतैं सीचणू नि चा,
ऊंदार…………… सारू चा।


लेख – @हरदेव नेगी
पहलकर्ता – PahadiBlogger.com

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *