गढ़वळी कविता बणांग (Garhwali Kavita Badaang)

garwali kavita badaang by hardev negi

गढ़वळी कविता बणांग (Garhwali Kavita Badaang)

रितु बसंत का दिनू मां,
बणांग लगी चा डांडी कांठ्यों मा,
कनक्वे खिलला रंगीला पिंगळा फूल,
डाळी बोट्यों कि पिड़ा उडड़ी चा धुवाँ मा।।

हे निरदैयी मनखी त्वैन फूकिनी चखुल्यों का घोल.
कख हरचि त्येरि मनख्यात कनक्वे द्योलु तु यूं कु मोल,
डाळी बोटी सूखणीं छन आग लगी चा धरती का जिकुड़ा मा,
धारा मंगरा रूंड़ा छन गागर तरसाड़ी चा पंणधार्यों का मुंड मा।
रितु बसंत का दिनू मां,
बणांग लगी चा डांडी कांठ्यों मा,

क्वंगळी डाळ्यों कु मोळ्यार मौळण से पैली रूखी गे,
अर बौंणा पंछी, जीवू का घौर त्येरी आगन रख्या कैगे,
रुड़ांदा कणांदा अणांदा बासदा पसु पंछी धै लगौंणा छन,
बुझावा ईं आग हमरा अपड़ा ईं चिता मा जूंदा जगणां छन्।
रितु बसंत का दिनू मां,
बणांग लगी चा डांडी कांठ्यों मा,

हे भला मनखी त्येरा बूत्यां नाज तैं पांणी हम दैंदा,
जब तु थौकि जांद हिंटण मा तब छैळ भी हम दैंदा।।
मतलबी मेल चा रख्यूं त्येरु हम डांडी कांठ्यों से,
तु बिसरी गे जींणू चा तु हमरी ही किरपा से।।
रितु बसंत का दिनू मां,
बणांग लगी चा डांडी कांठ्यों मा,

हमरा पिछने छन त्यारा बार-त्येवार,
हमरा बाना हर्यां-भर्यां छन तेरा गौं की सार,
ना घिंदूड़ी बासली ना घुघती घुराली घुर-घूर,
बतौ क्य हमरू दोस चा क्या हमरू कसूर।।
रितु बसंत का दिनू मां,
बणांग लगी चा डांडी कांठ्यों मा,

ये उत्तराखंड की न बिगाड़ अन्वार,
सजीली हिवांळी कांठी न ख्वो ये कु सिंगार,
समळी जा हे मनखी तु भी म्येरि पिड़ा जांण,
सूखी जालु जु यु पहाड़ हरची जाली त्येरि पच्छांण।।
रितु बसंत का दिनू मां,
बणांग लगी चा डांडी कांठ्यों मा,

लेख्वार :- हरदेव नेगी

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