गडुलि “माँ मि भि ल्यांदू”

gaduli by pahadi blog,

ब्याखुनि का घाम गाड पार पहुँचने लग गया, उधर मां ने अपनी सिराणीं दाथुलि हाथ में लेकर दो गडुलि घास बांजा की काटने के लिए निकल ही रही थी कि, माँ की सांखी का लड्या अपनी माँ से कहने लगा कि मि भि आता हूँ बल तेरे साथ पुंगड़े में, मां ने उसको अपने ख्वौला के छ्वोटा नौन्यालों के साथ खेलने के लिए कहा पर वो इतना जिद्दि था कि वहीं चौक (खोला) में रिच्या ने लगा और रोने लगा, पर माँ भी बड़ी लाचार थी, और माँ पर यकुलांस भी थी, बच्चे के बुबा जी परदेश में नौकरी करते थे, बच्चपन में ही दादा – दादी का सुख बच्चे के सर से उठ गया था, शायद उसकी किस्मत में दादा दादी का लाड दुलार नहीं था, था तो बस माँ की ममता. पर माँ ने उस कमी को कभी अपने बच्चे को महसूस नहीं होने दिया बगत-बगत पर उसकी नानी अपने बेटी के सौर्यास आती रहती हैं और नानी भी ये बात भली भाँति जानती थी कि छोटे बच्चों का लालन पालन माँ की ममता से पूरा नहीं हो पाता, उसके लिए दादा – दादी का लाड धुत्कार की जरूरत जरूर चाहिए, पर आखिर माँ उसे अपने साथ ले ही गई, और एक छोटी सी सिंराणी अपने पास और ले गई, क्योंकि माँ उसकी जिद्द को समझती थी, वो अपने माँ के आगे चल रहा था और माँ उसे गौला (खेतों के रास्ते) पर कैंसे खुट्टि रखना है सिखा रही थी, जहाँ पर वो नहीं चड़ पाता माँ पीछे से थैल रही थी, और बच्चे के पाँव अपनी उस मिट्टि व थाती में चलने के लिए और आतुर हो रहे थे, और पहाडों का सुख और संघर्ष बच्चे के पैर महसूस कर रहे थे, भले बच्चा अपनी अठखेलियों में मस्त होकर चल रहा हो मगर वो नहीं जानता कि वो किस विरासत को चूम रहा है.

अक्सर गौं की स्कूल में छुट्टि के दिन छ्वोटा नौना भी ग्वोरू के साथ पुंगड़ों में जाते हैं, ये सही भी है क्योंकि प्रकृति से प्राप्त खुशि हमेशा इंसान को सुख की दिलाशा दिलाती है, बाजार के किसी शौंपिंग मौल में खरीदी हुई खुशी कभी बच्चे के मन को नहीं भर सकती. अब जैंसे ही लड़का अपनी माँ के साथ पुंगड़े (खेत) में पहुँचा तो माँ नहीं उससे एक जगह पर बैठा दिया, उसको दो चार पके बेडू दिये खाने को, और माँ बांज के पेड़ पर चड़ने लगी, वो अपनी माँ से छ्वीं बथ लगा रहा था, माँ को देखकर उसका मन भी पेड़ पर चड़ने को लालाहित होने लगा, और वो पास के ही बेड़ू के पेड़ पर चड़ने की कोशिश करने लगा, द्वी चार बार वो आधे तक चड़ा पर फिर नीचे रड़ (फिसल) गया. आखिर उसके अंदर की मेहनत की ललक ने उसे पेड़ पर चड़ा ही दिया, और वो पेड़ पर जाते ही दो ठहनियों के बीच बैठकर उसको हिलाने लगा, गाड़ी के घुंग्याट की तरह आवाज निकालने लगा, जब माँ ने उसे देखा तो माँ डाटने लगी और कहने लगी रुक तू भ्वैं आने दे मुझे तेरा घुंग्याट मैं निकालती हूँ बाहर बल. अब माँ सरासर बांज की टहनियाँ काटने लगी, क्योंकि माँ को डर था कहीं ये फरक ना जाये पेड़ से. पर वो मस्त होकर अपनी पेड़ वाली गाड़ी चलाने लगा. डांडा गौं में ह्यूंद के दिनों में बेटी ब्वारी व किसाण बैख बांज बेडू तिमला को काटते हैं क्योंकि मौ का महीना के बाद मौल्यार सरने लगता है जिससे जिससे कि नयीं कोंपल पेड़ों पर आ जाये. अब माँ ने अपनी एक भारू भर बांज की काट ली थी, और पेड़ से नीचे उतरने लगी थी, बच्चे की नजर माँ पर गई तो उसके मन में डौर होने लगी कि कहीं मा सच में उसे ना कूट दे नीचे उतरकर ये देखकर वो माँ से पहले उतरने की कोशिश करने लगा और, जैंसे ही वो द्वी फांगों के बीच तक पहुँचा तो उसकी खुटि फंस गई, और वो माँ को बठ्याने लगा और रोने लगा माँ में फरक्यूं, उसके खुट्टे थतराने लगे आँसू व सिंगड़े से गिच्ची व गल्वाड़ि लब लबकार हो गई, पर उसने चम्म पकड़ कर रखा था, क्योंकि उसको भी पता था कि अगर चम्म (कसकर) ना पकड़ा तो वो फरक (गिर) जायेगा. पर वो उसकी पहली उड़ान थी जिंदगी की पर शायद दूसरी बार वो कभी नहीं फसेंगा दो फांगो के बीच.

माँ जैंसे ही नीचे उतरी और उसको पेड़ से उतारा फिर उसकी नकुड़ी व गल्वाड़ी को साफ किया, और डाँटा भी एक घमाक भी मारी और सांखी से भैंटा भी. माँ ने अपने तीनों रूप के दर्शन उसे वहीं पर करा दिये. अब माँ ने उसे पहाड़ी ठौफी दो चार पके बेडू और दिये और फिर वो शांत हो गया, अब माँ बांज की ठहनियों को इकट्ठा करने लगी और भारू बांधने लगी तो बच्चे ने माँ को हल्के आंसू सी भरी आंखों से देखा और कहने लगा माँ एक गडुलि मि भि ल्यांदू, (Gaduli)  ने कहा ने ना कह दिया कि तू ऊंदार के बाटों में फरख जायेगा और घाम भी गाड पार के बौंण की तरफ पहुँच गया मुझे अब्योर हो रही है, पर बच्चा जिद्द करने लगा, आखिर माँ ने एक दौर दौर की पूली बनाकर एक छोटि सी भारी उसके पीठ पर लगा दी फिर वो अपनी माँ के आगे चलने लगा, माँ ने उसकी भारी पीछे से पकड़ कर रखी थी क्योंकि माँ को ये आभास था कि वों कहीं ना कहीं पर जरूर रड़ जायेगा, जब भलि म्येस कर कै आखिरकार वो ये संघर्ष का भारा अपने गुठ्यार के बाटे तक पहुँचा, उधर गौं की ब्वारी लड़के की ब्वे को कहने लगे, एै लो भुलि अब त्यारू नौनू भि किसांण ह्वेगि लों अब नि रै त्वै पर यकुलांस” जैंसा कि अक्सर गाँव में ठटा मजाक में बोलते हैं. लड़के की माँ ने भी मजाक में जवाब दिया कि अब मि एक भैंसी और रखूंगी बल. सुद्दि बल आफत करने के लिए आ गया मेरे साथ. जैंसे ही गुठ्यार के पास पहुँचा तो भैंस व ग्वोरू अपनी गुसेण को देखकर अढ़ाने लगा, और रींगने लगा. और माँ ने पहले अपना भारा नीचे रखा फिर अपने बच्चे के पीठ से उसका भारा निकाला जो गुठ्या पहुंचते पहुंचते यकतरफा (एक तरफ झुका हुआ) हो रखा था, उसकी क्वोंगली गल्वाड़ी लाल हो रखी थी.

माँ ने उसकी क्वोंगली गल्वाड़ी पर एक भुक्कि ली, और उसकी पीठी को झाड़ा फिर अपनी धांण पर लग गई, जब उसने अपनी माँ से कहा कि माँ गडुलि मि भि ल्यांदू तो शायद उसने अपने जिंदगी के पहले संघर्ष को स्वीकारने की कोशिश की, वो घास गडुलि कोई साधांरण गडुलि नहीं थी वो गडुलि इंसान से लेकर पशु तक व पशु से लेकर खेतों तक और खेतों से लेकर प्रकृति तक को सींचती व पोषण करती है. ये संघर्ष हर पहाड़ के गाँवों में रहने वाले लड़के व लड़कियों की जिंदगी का पहला संघर्ष होता है यही संघर्ष उनको शाररिक रूप से मज़बूत बनाता है, जिंदगी में कितबों के साथ साथ उसका इंसान का शाररिक रूप से मजबूत होना चाहिए, अक्सर जो लोग कितबों के संघर्ष से निकल कर जिंदगी के संघर्षों से रूबरू होते हैं तो तब वो जिंदगी से हार जाते हैं. क्योंकि माँ पिता अक्सर अपने बच्चों को किताबों की गडुली थमा देते हैं और बाकी संघर्षों से दूर रखते हैं जो कि गलत है, बच्चों को हर उस संघर्ष से अवगत कराना चाहिए जो आपने देखा है या झेला है.

लेख: हरदेव नेगी

12 thoughts on “गडुलि “माँ मि भि ल्यांदू””

  1. वाह जीवन संघर्ष को बखूबी दर्शाया इस गढ़वाली दर्शन से ,,,

  2. Behat khubsoorat!!! IAM glad U have developed ur own style of writing…Its always interesting to read ur posts….it’s another story very close to my heart….hats off to you 😊

  3. बहुत ही सुन्दर गडुली,,जीवन के यथार्थ को दर्शाती ये कहानी,,हर गढ़वाली के दिल के करीब ,,

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