फट्यूं सुलार

Fatyun Sulaar -  Pahadi blog,
उत्तराखंड के गांवों में बच्चे के जन्म की पारंपरिक कहानी

जन्म महीना और निभाई जाने वाली परंपरा

ब्वारी (बहू) का प्रसव होने का नौ वां  महीना चल रहा था, सासू ने  ब्वारी को पास वाले धैणा में घास काटने के लिए  भेज रखा था वो  भी  घर  से  दूर जंगल  के रास्ते  में  था,  सौंण  का  महीना उपर  से घनगोर  बरखा  के  आसार  भी  थे,  सासू  खुद  अपनी  गौशाला  का  एक कमरा  खाली  कर  रही  थी वहां  रखे सभी  सामान  नाड़ू  नेसुड़ु, मय्या, लाखड़ा, कंड़ि और न्यार  को दूसरे  कमरे  की  सांदी  ढेबरा  रख रही थी,क्योंकि ब्वारी जब  प्रसव  होगी तो  21  इक्कीस दिन तक वहीं रहना है बल सुलकड़ा, इस काम  में  दादी  की  नत्योंण  (नातिन) च  साल  की  थी  पर  दादी को देखकर  खूब  चल्का बल्की  कर  रही  थी.  दादी ने  गौशाला  का गुठ्यारगेंणा  साफ  चमका दिया  था,  और  धुवां रौली  लगा रखी  थी. अब सासू गोबर  व  मिट्टी  से  गौशाला  का  भीतर  लीप  रही  थी, दो तीन  गरूड़ के पंखसोलू  का  कानू  भी दीवार  पर  लगा दिए  जिससे  सांप कीड़े  ना  आये, नतिनी  भी दादी  की  सौर (नकल) कर रही थी और  भीतर  लीपने  में  मस्त  थी.  उसके  बाद  दादी  कुछ  मोटे मोटे बांज  के गले संट्या (छांट) रही थी. ये सब निपटाने  के बाद सासू पल्या खौला चली  गई और गौं  की दाई  को समझाया कि एै लों  दीदी तु ये  मैना  कहीं  मत  जाना  और  घर  के आस  पास  के सग्वोड़ो  में  ही  काम  करना  तुझे न्यार  घास  चाहे  होगा तो  में दें दूगीं. पर तू  कक्खी यनै-तनै (इधर उधर)  मत जाना, बल नौ वां महीना  लगी ग्ये  बल ब्वारी  का, हिठ भी भली रही है, पीढ़ा  वगैरह  भी नि  बताया बल.  पर दीदी मा त्यारा  सारा  छौं. उधर  होने वाले  बच्चे  के पिताजी दूर  त्रिज्युगीनारायंण  प्राथमिकता स्कूल में टीचर थे  आजकल ज्यादातर उनका ध्यान भी घर की तरफ  ही रहता था , पर करना  क्या  मजबूरी है नौकरी की,  फोन तो उन  दिनों  थे  नहीं  पर रैबार ही एक माध्यम था. कि कोई  सुखी खबर आयेगी.

अब सासू दोफहर के खाने  की तैयारी  कर  रही  थी  बरखा  भी  हल्की छिमट्या  रही थी,  और जंगल का बाटू (रास्ता) भी देख रही थी कि अभी तक  ब्वारी  किलै  नि आई होगी. धै  भी लगाई पर  सुनना  कहां से था गदेरे  का सबद  भी खूब था तो तब सासु  फिर  खाना  बनाने  पर लग गई, ब्वारी  ने  भी लगभग  घास  काट  ही लिया था  और  उसकी  सोल्टी  भरने  वाली  थी बरखा  भी तेज  होने  लग गई, ब्वारी  ने सोल्टी उठाई  और  दो तीन  खेत  की सीड़ीयां चढ़  चुकी थी  कि अचानक  ब्वारी  के  पेट  में  तेज  पीड़ा होने  लग  गई और  ब्वारी  वहीं  खेत में  बैठ  गई ब्वारी  एक  तरफ  से  आवाज  भी लगा  रही  थी  दूसरी तरफ  पीड़ा  और  बढ़ रही  थी पेट में,बौंण ( जंगल  ) से  घर  आने  का रास्ता  भी  दस बारह  खेत  उपर  था, उपर  से गदेरे का सबद (आवाज)  क्वे नजर  नहीं  आ रहा था.  बरखा भी और  तेज  होने लग गई, सासू  भी लकड़ियां  समेटने  में  लगी हुई  थी,  और  मन  मन  गगणाट कर रही थी  कि “मैंथे बारामास  या धांण काज  ह्वे, सु छ्वोरा  भि  छुट्टि  नी  ल्ये  संकणूं  ती  स्कूल बटि” उधर  ब्वारी  की  पीढ़ा  और तेज  बढ़ती  जा रही थी कि  तब  तक  जंगल  के  रास्ते  से चौकदार  ससुर  घर  की तरफ  आ  गये  और  उनकी  नजर  उन  पर  पढ़ी  तो ब्वारी  ने  भी ससुर जी  को देख लिया  और  हाथ हिलाया और  बठ्याने  (चिल्लाने)  लगी कि नीचे आओ, चौकदार  ससुर  पुंगड़ा फाली  (छल्लांग)  मारते मारते  नीचे  खेत  में  पहुंचे  और  देखा कि ब्वारी  की  तबीयत  खराब  है  और  चौकिदार ससुर 100 की स्पीड  से  भागकर  घर  पहुंचे, और  सब  ब्वारी  की सास  को बता दिया, सास  ने  दाई  को आवाज  लगाई, चौकदार  ससुर  ने  गांव  के  दो  चार  लड़कों  को इकट्ठा  किया और  चारपाई  लेकर  खेत  की तरफ  भागे, सासु रास्ते में  जाते वक्त खुद  को  नटी सटी बखने  लग  गई, ” कि कन्न  सन्नी पात  ह्वेगी  मैंथे  ईं  बुढेंन  दबै  मैं  रांडे  अकल  कैन  ख्वे  जु  ब्वारी  घासो तैं  ख्येदी, ब्वारीन  भी सुबेर  कुछ  नि  बथै, और  सब  लोग  खेत  में  पहुँच  गये  और  ब्वारी  को  चारपाई  से घर  लाने  लगे, वो  तो  ब्वारी उस  जमाने की थी  तो  ब्वारी ने  खूब  घी  दूध  छांच क्वोदे  झंगोरा  खाया  था  तो  ताकत  खूब  थी शरीर  में जो  पीढा  सह गई. घर  पहुंचते  ही  गौं की  दाई  पर  था सब  कुछ निर्भर, वैंसे  भी गौं  की  दाई  के  हाथों  आज  तक  सारे  बच्चे  सकुशल  जन्मे  है और दाई  को  दूसरे  गांव  के लोग  भी बुलाते  थे, एैंसा  घरेलू चिकित्सा  का सग्वोर  था  गौं  की दाई में. लगभग  आधे  घंटे तक  के घरेलू पध्दति के उपचार में  ब्वारी  ने  बच्चे  को  जन्म दिया  ब्वारी  भी ठीक थी,  उधर  जेठानी  नी  गरम  पानी  का ईंतजाम  कर  रखा था,  और एक  पुराने डब्बे पर  गाय  का गोत्र भी रखा था, गौशाला के कमरे  में  आग  जल  चुकी थी , पहले पुवाल  और  उसके उपर  एक  गद्धा  बिछा  दिया  गया. सासु ने  घर  के कूटू हुए  चाँवल  और घी  का डब्बा सत्तू सब  अपनी  जिठांण  के पास  दे  दिया.  पीने  का गरम  पानी भी अलग  कर  दिया, उधर  सासु  सारा  सामान  अपनी  जिठांण  को थमाने  के  बाद  गांव  के स्वीलांणा चली  गई और  वहाँ  से  सफाई  करके  लौट  गई. कल  सुबह  ब्वारी  वहाँ नहाने  आयेगी तो  इसलिए  उस  प्रसव घर  की सफाई  करना भी जरूरी था. 

अंधेरा भी होने लग गया था सासू ने भी भैंसी पिज्या दी थी,  और  जिंठांण रोटी पका रही थी, पीछे के चुलड़े में गरम पानी रखा था जिससे रात के समय बच्चे को नहलाना था, दादी गौशाला से  आई  और  सबसे पहले  ब्वारी के  लिए  भुजे  हुए गेंहू के  आटे की  बाड़ी बनाई और उसमें  चार डली घी की  डाल दी  जिससे ब्वारी पर  कमजोरी न  आये, ब्वारी को  खाना देने  के  बाद  अपने ख्वोला के  एक  दुकानदार के पास गई और उससे कहा कि कल  सुबेर वाली डाक  गाड़ी  से  त्रिज्युगीनारेण  का कोई  होगा तो  उससे  रैबार पहुंचा देना कि  ब्वारी  स्वीली हो गई  और  ब्वे  और नाती  राजी खुशी हैं  छुट्टि लेकी घर  आ जाना  बल,  अब दादी और दादी की जेठांण खाने लग गई थी,  दादी की नत्योंण भी  अपने  भुल्ले को देखने की जिद कर रही थी,  खाना खाने  के  बाद  दादी बगल में गौशाला चली गई और  बच्चे  को नहलाने  की  तैयारी में लग गई, एक  टहनी  कंडाली  की  की  काटकर पीतल की परात के पास रख दी और साथ में दरांती भी जिससे बच्चा पर छौल ना लगे, दादी की नत्योंण अपने छोटे  भुले  को देखकर मन  मन अपने में खित-खित हंस रही थी. और अपने भुले को पकड़ने के लिए उसके हाथों में कुतग्याली हो रही थी, पर  क्या करें दादी ने कंडाली भी रखी थी,  अब दादी ने  बच्चे को नहलाने के  बाद  आटे  की  छोटी  गोंदकी सरसों के तेल से नाती की मालिस करने लगी,  पहले के बच्चों की मालिस इसी से करते थे, जिससे बच्चे के शरीर में बाल न रहें और हड्डियां मजबूत हो जायें अब इसकी जगह जौनसंस बेबी वालों ने ले ली है बल,  दादी उसके कमरी में खूब छपाक मार रही थी. और आटे की गोंदकी से खूब रगड़कर मालिस कर रही थी, फिर आग में हाथ तपा कर बच्चे के हाथों पैरों को सेक रही थी.  लड़का रो रहा था तो उसकी दीदी उसकी ठटा लगा रही थी और माँ को बोल रही थी कि देख भुला एैंसा रो रहा है. उसके बाद दादी ने लालटेन को कम किया और सो गई. सुबह के बगत सासू ने रिंगाल से बनी हुई एक छोटी हथगुनी टोकरी उठाई जिसमें गौंत्र था, नहाने के लिए आगे ब्वारी चल रही थी तो सासू पीछे से गौंत्र छिड़कर रही थी, गाँव के किनारे वाले गदेरे में स्वीलंड़ा था नहाने का, ब्वारी के पास एक पीतल की परात और बच्चे के कपड़े थे

मेहमानो की आवाजाही 

अगली सुबह बच्चे के पिता सुबेर की डाक गाड़ी से घर आये बाजार में उन्होनें  बच्चे के ममाकोट रैबार दिया,  सेरा गौं रास्ता भर में लोग बधाई भी दे रहे थे.  घर पहुंचते ही बच्चे की दीदी ने  पापा को बताया कि मेरा छोटा भुला हो रखा अर वो मुझे देखकर खित खित हंस रहा था,  यरां देबो बच्चपन भी कितना मैलुक होता है.  फिर बच्चे के पापा ने थौ टेकी और गौशाला चले गये बच्चे का हाल समाचार पूछने. तो बच्चे के परिवार के एक दादा टेलर मास्टर थे उन्होनें नाती के लिए एक “फट्यूं सुलारडांगरीसल्थराज सिलना शुरु कर दिया, डांगरी एक एैंसा बच्चों का  पहनावा है जो पहले पहाडों में  छोटे बच्चों के लिए सिला जाता था जिसको  के पीछे से सिला नहीं जाता था और जिप की साइट सिला जाता था जिससे बच्चे का बार बार सलवार न बदलना पड़े, अब इसकी जगह डायपर आ गये हैं बाजार में जब रैबार बच्चे के ममाकोट पहुँचा तो बच्चे के  नाना नानी ने  रात को  झौला तैयार कि उसमें बेटी के लिए तीन मंण घी, सत्तू, घर के  चांवल और बच्चे के लिए कपड़े और हाथों के लिए चाँदी के धगुले रख दिए और अगले दिन नाना नानी पैदल ही सूबह निकल गये, और दोपहर के खाने तक वो भी अपनी बेटी के घर पहुंच चुके थे, उधर बच्चे के मामा ने बाजार आकर अपने भांजे के लिए सुनार से चाँदी की हांसुली बनाने को कहा पहले मामा अपने भांजे को हांसुली जरूर देता था.  बच्चे की फूफू भी अगले दिन ही रौड़ी दौड़ि अपने मायके आ  चुकि थी.  आज कल खूब मेहमान की आवाजाही लगी थी चा का कितला भी चुल्ले से नहीं उतर रहा था.  ख्वौला के लोग भी खूब मौ मदद कर रहे थे. अगेंठा की आग सुलकड़ा भितर हल्की हल्की सुलग रही थी, सासु घास न्यार जाने से पहले ब्वारी को समझा रही थी कि  लड़के को बगत (समय) दूधी पिला देना, और अपने लड़के को लकड़ी फाड़ने के लिए कहा और बेटि को सुलकड़ा मत जाने देने को कहा बल ये भारी जिदेर है. शाम को गौं की तीन बुड्या दादी ब्वारी की संत खबर करने  आये, बच्चे का पिताजी को बधाई भी दी  और  सुलकड़ा भीतर चले  गये  उनमे  एक दादी खूब देबता वाली थी  तो  दादी ने  अपने  पागुड़े  से  कुछ ज्यूनाल निकाले और लड़के के  उपर घुमा कर उत्तर और दक्षिण दिशा में डाल दिए, फिर वो भी अपनी गपोड़ियों मे लग गये,

21 वां दिन और शुद्धिकरण 

21 वें  दिन की झरफर भी आ चुकि थी बस आज तक ही ब्वारी को गौशाला वाले कमरे में रहना था, बच्चे के पिताजी बाजार से  “दाई के  लिए  एक  साड़ी और  सौल  व  दो  किलो लड्डू लेकर आये  व  पंडित जी  के  लिए  एक  धोती उस दिन दादी और लड़के के  नानी व फूफू ने  सुबह चार  बजे उठकर पहले  घर  में रसोई व  देबता की भीतर को  लीपा फिर  सारे  घर  के कमरों  की  सफाई के साथ  गोत्र छिड़का अपना पूरा ख्वोला खाने पर वहीं था लड़के के पिताजी के यार दोस्त थे  गाँव उन दिनों ठेका नहीं था तो  कच्ची जुगाड़ कर रखा था, फौजी भी कोई छुट्टी नहीं आ रखा था,  अब पूजा  का समय हो रहा था  तो  फुफू पर  बच्चे के दादा जी का भूत भी आ गया था, अगरबत्ती और जलाकर फिर पानी पिला कर भूत को शांत किया, सौंण के महीने  में जन्मा तो दादी ने  बच्चे का घर नाम सौंणू रख दिया.  बच्चे के  पास  खूब  लता कपड़ा और  चांदी की धगुली हो गई थी,  और  अब  अपने  घर  में रहने  लग गये  थे. अब सब लोगो जो भी आये थे जाने की तैयारी करने लगे, फुफू नाना,नानी कल  सुबह निकलेंगे  और  बच्चे  के  पिताजी  की छुट्टियाँ पूरी  हो  गई थी,  ये  थी  कहानी  उत्तराखंड के  गांवो  में  जब  किसी  बच्चे का जन्म होता  है तब क्या महौल और परंपरायें  निभाई जाती हैं, 

लेख  हरदेव नेगी

16 thoughts on “फट्यूं सुलार”

  1. हरदेव भुला तुम्हारा लेख तें पड़ी बहुत खुशी होनी आगे भी तुम गढ़वाली कल्चर प्रमोट करें आपन लेख बहुत ही अच्छा छन

  2. भौत सुन्दर दिदा ।
    यनि लिखणा रा, गढवली भाषा तै अपणी कथा कहान्यू मा समलौणा रा ।🙏🙏🙏🙏

  3. बहुत सुन्दर ….यादें जो अपने समेटी हैं भैजी🙏

  4. अरे वाह पहाड़ी क्षेत्र की बिल्कुल सत्य परिघटना बहुत सुंदर

  5. नवीन डिमरी 'बादल'

    सुन्दर लेख है भाई जी, बधाई है, लिखते रहो यही सलाह है !

  6. भोत बढ़िया लिखियु चा आपकु पुरु गांव कु उ जीवन याद आईगे जो हमारी माजी होरों हमारी बथिक जियूँ होलु वाह❤️

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