दिल से नहीं दिल्ली से

दिल से नहीं दिल्ली से (Dil Se Nahi Delhi Se)

जब पूरे भारत की नजर दिल्ली की तरफ होती है, तब बात दिल से नहीं दिल्ली से होती. अगर दिल्ली से ही दिल की बात निकले तो फिर दिल्ली को या तो दिल की सुननी पड़ेगी या फिर दिल्ली की, और ये दिल्ली के लिए आसान नहीं है, तुम चाहे इसे राजनीति का शहर कहो, पत्रकार के कलम की स्याही कहो, औद्योगिक क्षेत्र का विकास कहो, शिक्षा का केन्द्र बिंदु कहो या फिर सरकारी सेवा पाने वाले उन चेहरों की उम्मीद कहो ये हर तरफ से लोगों के दिलों को भा जाती है, क्योंकि ये नई दिल्ली भी है और पुरानी दिल्ली भी है. भले ये सबको भा जाती है पर ये अपना रूप बहुत जल्दी बदल देती है, इतिहास गवाह है, ये पांडवो का इंद्रप्रस्थ भी थी, ये मुगलों की दिल्ली भी थी, ये सिखों के धर्मगुरु तेग बहादुर सिंह की दिल्ली भी थी जिन्होंने अपना सर्वोच्च बलिदान इसी दिल्ली की धरती पर दिया व ये उन अंग्रेजो की गुलामी कि दिल्ली भी थी जहाँ से उन्होने पूरे भारत पर राज किया, पर ये दिल्ली आज तक किसी की नहीं हुई, गांधी हो या भगत सिंह, सुभाष चंद्र बोस हो या मंगल पांडे, नेहरू हो या बल्लभ भाई पटेल सबने अपने-अपने तरीके से दिल्ली को चाहा मगर दिल्ली ने अपनाया सबको है पर अपनापन सिर्फ दिल्ली से रखा किसी और से नहीं, सतयुग हो या कलयुग दोनों युगों में आजीवन दिल्ली का कोई नहीं हुआ, क्योंकि ये दिल वालों की दिल्ली नहीं है, ये राजनीति करने वालों कि दिल्ली है, तब मैं कहता हूँ दिल से नहीं दिल्ली से(Dil Se Nahi Delhi Se).

आखिर क्यों कहता हूँ मैं दिल्ली से नहीं दिल्ली से:-

जब भारतवर्ष की सबसे पवत्रि नदी इंसानो का पाप धुलते धुलते खुद अपवित्र हो जाए, जब विकास के नाम पर उस भागीरथ के तप को कुचला जाए और बड़ी बड़ी कंपनियों का अपशिष्ट गंगा में प्रवाह किया जाए, जब नदियों से उनका घर छीना जाए मतलब बड़े बड़े बांध बनाकर नदियों का अस्तित्व मिटा दिया जाए, जब गंगा सफाई के नाम पर करोड़ो का बजट दिल्ली में तमाम वो ज्ञापनों, अखबार की सुरखियों व शिलान्यास करके गबन कर दिया जाए, जब आस्था के नाम पर व्यापार की आस्था हावी हो जाए, और जब दिल्ली में खुद यमुना अपने अस्तित्व के लिए लड़ जाए और बात गंगा सफाई की होती है तब खुद भागीरथ की गंगा दिल्ली की ओर देखकर कहती है कि जो तुम्हारे घर के सामने अपने जिंदा रहने की भीक मांग रही हो और तुम गंगा सफाई की बात करते हो तब उसी हिमालय से उत्पन्न हुई दो अविरल धारायें भी कहती हैं दिल से नहीं दिल्ली से. क्योंकि उस गांगा की सफाई में अबतक जितना जनता का पैंसा नेताओं अफसरों ने साफ किया है उतने बजट में आज यमुना का पानी हिमालय की तरह दिल्ली में भी पीने लायक होता, पर जिन्होंने देश की गरीब जनता का खून पिया हो ये तो फिर भी यमुना नदी है.

खून पसीना किसानों का बोले:- दिल से नहीं दिल्ली से,

भारत एक कृषि प्रदान देश है और हमारे देश में दो तरह के किसान रहते हैं एक किसान जो दिन रात करके व अपना खून पसीना बहाकर जब खेतों को सींचता है तब जाकर भारत का हर एक व्यक्ति अन्न को पाता है ये वो किसान है जो मौसम की मार भी सहता है, जो गरीबी की लात भी सहता है और कर्ज ना चुकाने पर मौत को स्वीकारता है ये ही एक सच्चा किसान है जिसे अपने बोए हुए बीज की कीमत तथा अपने खेत की मिट्टी की पीड़ा महसूस होती है, दूसरा है राजनीति वाला किसान जिसके दादा पर दादा खेती करते थे और आज भी बड़े शौक के साथ जब जनता के बीच जाता है तो खुद बड़े गर्व के साथ कहता है कि मैं भी एक किसान का बेटा हूँ और उनके हक्क की बात रखने के लिए जब यह किसानों का नेता बन जाता है तो दिल्ली के लुटियंस जौन में घर बंगला मिलने के बाद उन गाँव की सड़को पर जब मंहगी मंहगी गड़ियों से जाता है जहाँ गाय, ट्रैक्कर व किसान नंगे पाँव चलता है और उनकी पाँव में पड़े घावों को झूटे वांदो का मरहम लगाता है तब किसानों की उम्मीदें भरी आंखे भी कहती हैं दिल से नहीं दिल्ली से आवाज निकल रही है. अक्सर किसानों के साथ जितना भद्दा मजाक आज देश की तमाम राजनीतिक पार्टियां कर रही है, उससे किसान आज टूट सा गया है, जिन बच्चों ने कभी हल नहीं चलाये, कभी खेतों की मेंडो को नहीं खोदा, कभी खेतों में गोबर नहीं डाला, कभी अनाज की कीमत नहीं समझी आज वो कृषि मंत्री से लेकर किताबों के बल पर साइंटिस्ट बने पड़े हैं, और इनके कंधे पर देश की कृषि व्यवस्था का भार है, और इस कृषि उत्पादन छमता को दो गुना करने का लक्ष्य इनके कंधो पर हैं, जिनके कंधों पर ये भार ये उनके बैंक खाते आज किसनों की खेती से ज्यादा उपजाऊ हैं, और ब्याजदर किसानों के फसलों की कीमत से लाखों गुना हैं, बस यही हैं वो किसान पुत्र जिसकी फसल दिल्ली में आकर विकसित हो गई,

सड़कों पर गुजरती जिंदगी बोले दिल से नहीं दिल्ली से:-

दिल्ली से ही पूरे भारत में एक एैंसी किंरण निकलती है जिससे हर दूसरा गरीब व्यक्ति खुद के जीवन में उजाला देखता है, वो उजाला जिसमें एक हंसता खेलता उज्जवल भविष्य हो, हर किसी की एक छत हो, हर किसी के पेट तक अन्न पहुँचें, उसके बच्चे अच्छी शिक्षा ग्रहण करें, उसकी तरह उसके बच्चों की जिंदगी ना गुजर, किसी गरीब की जिंदगी सड़कों पर ना गुजरे एैंसा सपना एक गरीब दूसरे के लिए देखता है, देश की राजधानी से जब उनके सपनों को पूरा करने का आश्वासन दिया जाता है जब हर गरीब को घर व उसके बच्चे को शिक्षा व स्वास्थ्य सुविधाएं देने का संकल्प राजनीतिक दल करते हैं मानो एैंसा लगता है जैंसे कि देश खुशहाली की ओर जा रहा हो, पर एैंसा होता है नहीं अगर गरीब गरीब ना रहे तो राजनीति कैंसे होगी, आजादी के बाद से अब तक गरीब का शोषण होते आया है वो एक वोट बैंक की तरह पिसा जाता है, उसकी बस्ती में हर साल आग लगती है उसके सपने हर साल झुलसते हैं, उसके लाचारी राजनीतिक दलों के लिए एक अवसर सा बन जाता है वोट बैंक का, रेल की पटरियों के किनारे वो जिंदगी बिताता है , रात को वो सड़कों पर सोता है, दिन के तेज धूप में वो रिक्शा चलाता है, उसका ना कोई ठौर है ना ठिकाना, जब देश की राजधानी दिल्ली में आज भी लाखों लोग सड़कों पर सोते हों, हजारों बच्चें भीक मांग रहे हों एक एक टुकड़े अन्न के लिए तरस रहें हो तब बात दिल से नहीं बल्कि दिल्ली से निकलती है, जब तक देश की राजधानी में गरीबों को सुखमय जीवन नहीं मिल जाता तब तक देश के दूसरे इलाकों में ये सपना देखना व्यर्थ है, क्योंकि जहाँ से नीतियां संचालित हो अगर वहीं नीतियां काम न करें तो फिर दूसरे राज्यों को एैंसे सपने दिखाना वोट बैंक की राजनीति से ज्यादा कुछ नहीं हो सकता।

स्कूलों व अस्पतालों की हालत बोले:- दिल से नहीं दिल्ली से.

एक युग था जब भारत की चिकित्सा व्यवस्था व शिक्षा विश्वभर में प्रसिद्ध थी, नालंदा व तक्षशिला जैंसे विश्वविद्यालय की शिक्षा पद्धति दुनियाभर के शोध कर्ताओं व विद्वानजनों को अपनी ओंर आकृषित करती थी, लेकिन अरबियन शासकों व अंग्रेजों ने सबसे पहले हमारी इस धरोहर को नष्ट किया और अपने अपने देशों की शिक्षा पद्धति भरतीयों पर थोपी जिसका उद्देश्य शिक्षा कम व्यापार व प्रशासन जैंसे कार्यों में कुशल नागरिक तैयार करने का उद्देश्य रखा, पर जब देश गुलामी की जंजीरों से ही मुक्त हुआ तो हमारे देश के राजनितिक विचारकों व दलों के नेताओं ने उनकी ही पद्धति को आगे बड़ाया जिससे कि शिक्षा दो भागों में बंट गई, जिससे कि शिक्षा के क्षेत्र में एक गहरी खाई बन गई, एक समान शिक्षा नीति जैंसी रंणनीति नहीं बन पाई क्योंकि सरकारों ने विदेशी पद्धति के विद्वानों के आगे घुटने टेक दिया, जिसकी जड़ें आज भी बहत गहरी हैं, एक तरफ सरकारी स्कूल जो कि अब केवल गरीबों बच्चों के लिए दूसरे निजी स्कूल जोकि ज्यादा आर्थिक स्थिति वालें बच्चों के लिए हैं, सरकारी स्कूलों की दिवारें जरजर होती चली जा रही हैं, सरकारी हुक्मरान की नीति के चलते आज खँडहर बनकर रह गये हैं स्कूल, विद्यालयों में शिक्षकों की कमी व बच्चों को कोई आधुनिक सुख सुविधायें नहीं है, खासकर उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, बिहार, उत्तराखण्ड, जम्मू कश्मीर, महाराष्ट्र, झारखंड छत्तीसगढ़ व गुजरात के सरकारी स्कूलों की हालत सबसे ज्यादा दयनीय है, वही हाल इन राज्यों में अस्पतालों व मैडिकल कॉलेजों की हैं, आज अस्पताल खुद आई सी यू में हैं व्यस्थायें एैंसी कि जो भी किसी मरीज के साथ अस्पताल जाता है वो खुद बिमार हैं, अपने घरों में उनपर एक दो ही बिमारियां लगती है मगर अस्पताल में जाते ही उनपर अनगिनत बिमारियां लगने लग जाती है। सरकार की योजनाओं केवल पत्थर पूजने (शिलान्यास) तक ही सिमट गई हैं, बड़ी मूर्तियाँ बनाने व देश परदेश में आलीशान बंगले खरीदने भारत के नेता आगे हैं मगर शिक्षा व स्वास्थ्य के क्षेत्र में आज भी बजट की कमी सरकारों को लगती है। नीजि अस्पताल अस्पताल कम पाँच सितारा अस्पताल ज्यादा लगते हैं जो कि अमीरों तक ही सीमित है गरीब आदमी तो वहाँ इलाज कराने का सपना भी नहीं देख सकता , कमीशन का जाल इतना बड़ गया है कि मैडिकल की फीस आज एक करोड के लगभग हो गई है, निजी स्कूल शिक्षा कम व्यापार पर ज्यादा ध्यान देने में माहिर है विदेशी संस्थानों के नाम पर भारत में स्कूलों का नाम है क्योंकि आज भी हम खुद से ज्यादा अंग्रेजों पर विश्वास करते हैं, प्राईमरी निजी स्कलों को फीस आज इंजीनियरिंग की पढ़ाई से ज्यादा है तो वहीं सरकारी प्राइमरी स्कूल मिडडेमील के खाने तक सिमट सी गई है, राजनेताओं के बच्चे जनता के पैंसो पर विदेशी स्कूलों में शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं व अपना इलाज भी वही करते हैं, यहां तो बस केवल दिल्ली से आश्वासन पर आश्वासन दिया जा रहा है, क्योंकि यहाँ बात दिल से नहीं दिल्ली से निकलती है, दिल तो जनता का होता है जो जल्दी ही मोम की तरह पिघल जाता है, नेताओं का दिल तो पत्थर की तरह होता है, जो कभी पिघलता नहीं है कठोर होता है, और राजनीति में कठोर दिल वाला ही हमेशा विजयी पाता है.

फिर कब निकलेगी दिल से बात:-

जब देश का नागरिक जितना शिक्षित है और उतना ही साक्षर होना शुरू हो जायेगा तब बात दिल्ली से नहीं दिल से निकलेगी, जब भ्रष्टाचार नेताओं व देश को लूटने वाले रसूखदार और दलों की अंधभक्ति में डूबना बंद हो जायेगा, तब बात दिल से निकलेगी, क्योंकि ये लोग देश की जनता को झूटे वादों से बरगलाते हैं और उनकी मासूमियत का फायदा उठा कर उनके हक्खों को पैंसा अपने विदेशी खातों में भरते हैं, और ये चाहते भी यहीं हैं कि देश की जनता उनकी अंधभक्ति में यूँही डूबती रहे और वो दिल्ली जाकर उनको झूटे आश्वासनों को अखबारों व विज्ञापनों में सजाते रहें. हमे एैंसे झूटे सपने दिखानों वालों से उनके सपने छीन लेने चाहिए, क्योंकि जो बात दिल से निकलती है वो बात सत्यता और सार्थकता से भरी होती है, जितनी पवित्रता आज भी गांगा के उदगम स्थल में है उतनी ही पवित्रता उस गंगा सागर में होनी चाहिए क्योंकि ये वही धरा है जो खुद मे एक विकास की गंगा बहाती है और देश के एक तिहाई भू भाग पर खुशहाली बनाये रखती है, ठीक उसी प्रकार देश की राजधानी दिल्ली से एक पवित्र राजनीति वाली गंगा की जरूरत है जिससे अरूणांचल से लेकर कच्छ की खाड़ी तक व लेह लद्दाख से लेकर कन्याकुमारी तक बहनी चाहिए.

लेख :- हरदेव नेगी

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