Dear दादी लो

Dear Daadi Lo,
बल् क्यूं नहीं होती है तुझे धांण काज की धों…??

उमर हो गई है तेरी सत्तर पार, बिना मतलब का समेट रखा हैं तूने बांजी पुंगड़ी अर् घौर बौंण का कारोबार, त्वेथै (तुझे) कितनी बार समझाना है कि तू ये बुढापे की स्यांणी (लालच)छोड़ दे. अर् चुपचाप हमरा दगड़ी परदेश चल दे.  पर करना क्या है तुझे समझा कर इस बुढापे में. अभी भी तुमने हफड़ा तफड़ी मचा रखी है और कितना होगा उन पुंगड़ो पर टक्क तेरी अमथ्या हो रखी है.पिताजी की नौकरी में कितनी ऐश है. शहर में घर है, सोसाइटी में स्टेटस है, कार है, माँ की स्पेशल स्कूटी है। और हाथों में सबके सगत-सगत स्मॉर्ट फोन हैं. और एक तू है इस जमाने में भी तेरे हांथो में सिरांणा है दाथुला है, व ढांगी ग्वोरू है, जिसके एक गिलास दूध के लिए तूने इतना बड़ा जंजाल कर रखा है,और एक खंद्वार मकान है जिसकी पठाली कभी भी रड़क सकती है.

तेरे खुटों की फटी हुई बिवांर और तेरे उस उस छज्जा धुरपला में पढ़ी दरार दोनों को देखकर हमें बहुत शर्मिंदगी होती है तब हमें तुझे दादी कहने पर भी गिल्टी फील होती है. इसी लिए माँ कहती है कि तुझे हम दगड़ा में ले जाना पसंद नहीं करते, क्यूंकि तेरी दादी की ना तो भौंण है ना भाषा, बस दिन भर धांण और कति होगा सुगड़ो पर उसकी चौमासा है. बल् इस बुडणी को तो ज्यूंरा (काल) भी हरच (खो) गया. कमर बांगी लाठी जन्न हो गई पर इसकी ज्वनि अभी तक नहीं टूटी. सुद्धि मुद्धि की बरमंड (सिर) पीड़ा हो गई है ये बुडणी हमारे लिए, पर Dear दादी लों,त्वे जन्न जिदेर कोई ना हो. तेरी बरमंड के बाल गोबी के फूल की तरह सफेद हो गये पर तेरे वो पुंगड़े हरे भरे ही हैं. कुजांणि क्या जादू है तेरे उन खरसांण्या हाथों में.

मुझे आज भी याद है जब तू मुझे अपने घूघी में रखकर सुगणों (क्यारी) में, गौं गुठ्यार(घर-गांव), में अपने साफे से बांध कर घुमाने ले जाती थी. तब तेरे पीठ में मेरा भार व मुंड में घास की गडुली रहती थी. पर कभी तूने यरां भी नहीं किया ना बोला की मेरा कमर झसक (मोच)पड़ गई.फिर क्यों उसके कमर में झसक पड़ गई जिसने तेरी कोख से जन्म लिया, जिसने तेरा दूध पिया, जिसको तूने पढ़ाया लिखाया और घास न्यार दूध कौदा झंगोरा बेचकर बड़ा साब बनाया. और किस बात के लिए आज भी वो दारू पीकर बंद कमरे में रोता है.तेरी ममता में वो ताकत क्यूं नहीं है Dear दादी जो एक ब्वारी के प्यार में है.”आखिर उस ब्वारी को जरा सी भी ये समझ नहीं आई कि उसका भी लड़का व लड़की बड़े होंगे तब क्या होगा, तुझे तो गांव में सब देखते लेते हैं तेरा हाल चाल सुख दुख पूछते हैं, पर तेरे कलेजे के टुकड़े और उसकी “My Life My Wife, व My better Half” कहने वाले को इस शहर में कौन देखेगा, आखिर मेरा भी ब्यो होगा मेरी ब्वारी भी स्वांणी (सुंदर) होगी. अब में क्या बोलू Dear दादी लों जिसने तेरा दूध पिया वही तेरा नहीं हो पाया तो मैने भी इस शहर में “अमूल व मदर डेयरी” का दूध पिया हैं. भला में भी कैंसे अपनी “Mom Dad” का लड्या (दुलारा)हो सकता हूं. तू तो फिर भी माँ थी मेरे तो ये “Mom-Dad”हैं, जिनकी ममता पहले ही (Mom)पिघल हो गई, और पिताजी का साहस (Dad)हो गया. बस आखिर में यही कहूंगा तेरा कर्म तेरा पुंगणों और गौं वाला नाता रिश्तेदारों ने देख लिया. इनके कर्म ये द्वी गज की बिरांणी पुंगड़ी देखेगी.

लेख – हरदेव नेगी

8 thoughts on “Dear दादी लो”

  1. Scathy but so true… beautifully written satire 👍 a true pahadi at heart can understand the pain this soft hearted grandson feels for grandmother who devoted her entire life for her kids

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