Dear चेता भुलि

Dear Cheta Bhuli-Pahadi Blog,
“Dear चेता भुलि” (गौं कब भ्योंटली)

Dear चेता भुलि वाकई गौं भर में सबकी डियर थी. दो भाईयों में सबसे छोटी थी तो भाई-बन्धुओं, दादा-दादी, “गौं-ख्वोला” सबकि लाडी थी. बच्चपन से मिल बांट कर भलि बुरी चीज परोसने वाला सुभौ था. अन्वार एैंसी थी कि जन्न झपन्याली बुरांस की डाली. खूब मजाक्योर भी थी. चेता का नाम चेता इसलिए भी पड़ा कि उसका जन्म चैत्र मास में हुआ था उसकी दादी व दादा जी उसे प्यार से चेता बुलाते थे. धांण काज में भी फरजंट थी, पढै लिखे में भी खूब होशियार थी और स्कूल के खेल कूद  खो-खो, में राष्ट्रीय स्तर तक प्रतीभाग किया था चैता नें. बल इतनी सग्वोरदार थी चेता.

चेता ज्वान जमानी की ओर बढ़ चुकी थी, दादा जी अपनी नतणीं का ब्यो होते देखना थे, उधर चेता के पिता फौज में थे जो कि दो महीने बाद छुट्टी आने वाले थे. चेता की मां के मन में एक ही टीस सदा रहती थी, कि भले मेरे बाबा जी ने मुझे गंगाड़ से डांडा मुल्क बिवाया हो पर मैं अपनी बेटी का रिश्ता डांडा मुल्क कतै नहीं करूंगी, पर डांडा गौं से भी उसके अच्छे खासे रिश्ते आ रहे थे क्वे फौज में था तो क्वे मास्टर तो क्वे किसी विभाग में क्लर्क, पर ब्वे का मन डांडा गौं के लिए खुश नहीं था, वही चेता के मामा लोग सब शहरों में बस चुके थे. और चेता की ब्वे ने ये बात अपने भाईयों को बता दि कि म्येरी चेता के लिए दिल्ली-देरादूंण की तरफ को रिश्ता देखो जिनका अपना घर हो और पहाड़ का मवासा हो. तो लड़की के मामा जी ने भी ये काम अपने जानने वाले पंडित को थमा दिया, पंडित की नजर में एक रिश्ता था दिल्ली का और चेता की कुंडली पंडित जी ने दिल्ली में रहने वाले पहाड़ी मवासे के लड़के से जुड़ा दी और लड़की के मामा जी को बात बता दी.

फिर एक दिन चेता के मामा दिल्ली आ गये और लड़के के परिवार को देखा 60 गज में बना चार मंजिला 3 बीएचके वाला फ्लेट और लड़के के पिताजी सरकारी जाब और लड़का आई की कंपनी में इंजिनियर था. बस लड़के पिताजी व मां का जन्म पहाड़ में हुआ था और लड़का दिल्ली जैंसी दिलेर मिट्टी में जन्म था वैंसे व सूरत व जात से पहाड़ी थे बस बाकी भौंण भाषा शहरी थी. मामा को परिवार भा गया और अपनी बहन व चेता के पिताजी की छुट्टी का इंतजार था. उधर चेता की ब्वे इस रिश्ते से राजी हो गई, दादा दादी उमर पर थे तो क्या अपना गिच्चा खोलते बस हां करदी. जब चेता के पिताजी घर आये तो चेता की ब्वे ने सब बता दिया, पर चेता के पिताजी इस बात से चिंतित थे कि गांव के माहौल में पली  बड़ी हमरी लाटी उस दिल्ली में कैंसे रहेगी यहां चेता के पिताजी ने कहा की मेरे साथ में एक सुबेदार हैं चमोली के उनका लड़का भी अच्छा है मास्टर है पौड़ी में उससे बात की है मैने अपनी चेता की. पास मैं भी है और जब चाहे मैत भी आ जायेगी दिल्ली बहुत दूर है, समझा कर चेता की ब्वे. पर चेता की ब्वे अपनी जिद पर अड़ी थी,स आखिर वही हुआ जो चेता की ब्वे चाहती थी, जल्द ही लड़के वालों को बुला दिया और बात पक्कि हो गई और मंगसीर में ब्यो का दिन कर दिया .

“चेता कु ब्यो का डोला अर् दिल्ली का बिरंणा ख्वोला”

मंगसीर महीना चेता की धूम धाम से शादी हुई और प्रदेश जाने के लिए चेता का डोला सज चुका था, स्कूल्या दगड्या, ब्वे बाबा दादा दादी गौं की चाची बौडी सब उसे छोड़ने गांव की धार तक आये और आंसुओं की पंणधार से सबके गाल रूझ चुके थे. और चेता जैंसे का डोला अपने गांव से सड़क के समीप आ रहा था बिचारी और भट्या-भट्या के रो रही थी और बार-यही कह रही थी “मै नि जांणू तैं बिरंणा मुल्क, शायद ये शब्द सच्चे थे पर वो क्या करती बेटी को तो एक दिन जाना ही है. पास के होटल जहां से दिल्ली वाले पहाड़ी बारात लेकर आये थे वहां रुकने के बाद अगली सुबह को दिल्ली रवाना होना था. शायद चेता की आखिरी भैंट थी अपने पहाड़ से. दान दहेज भी खूब हुआ दिल्ली भले ही देश की राजधानी है पर दहेज लेने में पीछे नहीं है दिल्ली वाले, बल पांच लाख कैशकार के पैंसे भी दिए गौंणा-पाता भी खूब हुए. अब चैता दिल्ली पहुंच चुकि थी. रिस्पेसन तक चैता का मन ठीक था क्योंकि भाई बन्धु छोड़ने आ रखे थे. उसके बाद चेता को वो 60 का गज के प्लोट में बने जिंदगी संवारने की चुन्नौती थी. ब्यो का बाद कुछ दिन घूमने में गये तो कुछ दिल्ली के पहाड़ी रिश्तेदारों में, घर भी फोन से रोज बात करती थी. खुद बिसराने के लिए विडियो काल भी. अब जब दो तीन महीने हो गये तो चेता को बिज्यां खुद लगने लग गई अपने गांव की दिल्ली के उस माहौल उसे रास नहीं आ रहा था. जहां हर रविवार चैता गांव में ग्वोरू के साथ, पुंगड़ो में जाती थी और कहीं भी मन मर्जी से चली जाती थी वहीं दिल्ली में उसे वो घर जेल जैंसा लगने लगा. पर क्या चेता जितनी स्वांणी थी क्या उसकी आगे जिंदगी इतनी स्वांणी थी? कतई ना. क्वोदा झंगोरा। चौंसा, कफलू, थैच्वांणी,  व भट्वांणी बनाने वाली चैता को ये शहरी खाना बनाना नहीं आता था, और उसकी ट्रेंनिग उसकी सास ने शुरू करदी थी. चेता अब वो सब कुछ सीखने की कोशिश करने लगी, सास ससुर भी खूब मिट्ठी गिच्ची करने लगे. पर असली चेहरा उसके इंजीनियर पति का था जो उसने ब्यो कै टैम व लड़की देखने कै टाईम छुपा रखा था, अब धीरे-धीरे वो आफिस से घर लेट आने लगा, और उसके चक्कर में चेता खाना खाना भूल जाती थी और बिना खाये ही सो जाती थी एक दो बार अगर फोन की करती थी तो उसका पति फोन काट लेता, और रात को बारह बजे घर आता, उसने ये बात जब अपने सास को बताई तो सास भी यह कह कर बात छुपा देती कि बेटी प्राइवेट कंपनी में कभी कभी देर रात तक काम करना होता है, जबकि एैंसा बिलकुल नहीं था. लड़का नबंर एक का नशैड़ी था, और उसे न जाने किन किन चीजों का नशा करने की आदत थी. ये बात पूरे गली के लोग व लड़के के रिश्तेदार सब जानते थे. पर यरां चेता बिचारी लाटी कुछ नहीं समझ पा रही थी.

चेता जब भी अपने घर बात करती तो सब झूट बताती कि यहां सब ठीक हैं और में खुश हूँ. Saturday Night मनाने वाला उसका पति रविवार की सुबह को ही घर पर दिखता, और दिन के बारह-बारह बजे उठता, एक दिन शनिवार की रात जब वो आया तो चैता ने सवाल कर ही दिया, पर वो झूट बोलकर बात छिपाना चाहता था, अगली सुबह जब चेता ने उसके कपड़े धोने के लिए निकाले तो उसकी जेबों से नशीले दवाओं के इंजेक्शन व सिगरेट के डिब्बे थे. चेता पढ़ी लिखि थी ही तो समझ गई थी. तो उसने अपने पति को फिर गुस्से से पूछा कि तुम नशा करते हो. उसने जिस वेग से चेता पर थप्पड़ मारा चेता वहीं पर बेसुध हो गई. जिस चेता को आज तक गांव में एक कांडा भी नहीं चुभा आज उस चेता की जिंदगी कांटो भरी हो गई और खुद की किस्मत पर रोने लगी. और उसके पति का रोज रोज का ये नाटक हो गया. चेता ब्यो से पैली जितनी स्वांणी दिखती थी आज उसके चेहरे का रंग उड़ गया था. वहीं दूसरी तरफ उसका पति बियर बार में अय्याशी करने में मस्त मगन हो रखा था. चेता खुद में ही सारे दुख घुटती जा रही थी सास ससुर भी कुछ नहीं बोलते थे अपने लड़के उनको लगा कि ब्यो के बाद उसकी आदत छूट जायेगी. इसी लिए वो गांव से ब्वारी लाये क्योंकि दिल्ली की लड़की भौत तेज होती है बल चाहे वो दिल्ली के पहाड़ी हो या कोई और, यही मकसद था भी उनका

एक दिन चेता की सास व ससुर पहाड़ आये थे चेता भी आना चाहती थी अपने पहाड़, भेंटना चाहती थी उन डांडी कांठ्यो को पर सास नि उसे घर पर रहने को कहा. आजकल उसके पति को और आजादी मिल गई थी. वो और लेट आने लगा चेता बहुत परेशान हो चुका थी. रात दो बजे जब उसका पति दारू के नशे में घर पहुंचा तो चेता ने गुस्से में पूछा कि तुम ये नशा छोड़ दो वरना में चली जाऊंगी, नहीं रहना मुझे इस नरक में. ये बात सुनकर उसने चेता का सिर दिवार से पटक दिया, जो ना हो सके वो गलियां दी मार मार कर उसने चेता को घायल कर दिया और उस पर नशे का इंजेक्शन लगा दिया चेता अपने सब होश हबास को चुकी थी. और वहीं जमीन पर पढ़ी रही. उस निरभगी को एक भी दया नहीं आ रही थी ना चेता पर. अगले दिन वो सुबह वैंसे ही आफिस चला गया उसने चेता का हालचाल भी नहीं पूछा, दिल्ली के आस पड़ोस बस कहना ही क्या, चेता को लगभग दोपहर दो बजे होश आया उठी तो उसे रिंग लगने लगी जैंसे जैंसे उसने खुद को संभाला, हाथ मुह धोया, रो रो कर अपनी ब्वे, मामा को गालियां देने लगी. फिर उसने अपने पिताजी को फोन किया. आधा घंटे तक फोन पर रोती रही, पिता इतना लाचार हो गया था कि एक तरफ बोडर पर होकर देश की रक्षा में खड़ा था मगर बेटी की रक्षा ना करने में मजबूर महसूस कर रहा था. चेता की बातें सुनकर पिता मन ही मन आंसू पीने लगा. भला जिस बेटी को पिता ने कभी मजाक में भी एक थप्पड़ नहीं मारा आज वो शादी के बाद उसकी दशा और दिशा देखते ही खुद पर गोली मारने का मन्न कर रहा था. चेता के पिता ने चेता को समझाया का में छुट्टी लीक ओलु हैका मैना त्वे वापस गौं लिजोलु म्येरि लाटी चिंता नि कर, पर पिता को क्या मालूम था कि एक हफ्ता उसके जिंदगी का आखिरी हफ्ता होगा. उस दिन भी उसका झांजी इंजीनियर पति रात को देर से आया और रोज की नशे की हालत में धुत था. चेता ने उस दिन खाना नहीं बनाया उसके लिए भला बनाती भी क्यों, उसने गाली देकर चेता को कहा खाना ला मेरे लिए चेता ने नहीं कहा जहां से आये हो वहां केवल दारू मिलती है खाना नहीं मिलता. उसने फिर चेता पर थप्पड़ मारना शुरु किया, चेता की संयम की सारी सीमा टूट चुकी थी किचन से चाकू लेकर चेता ने उस शराबी के पेट में घौंप दी व उसके गले आस पड़ोस के लोग रोज की तरह बालकोनी से रोज की तरह तमाशा देख रहे थी. चेता ने दूसरा वार उसके गले पर कर दिया और वो जमीन पर गिर गया खानदान का वो शराब की लौ से जलने वाला दीपक बुझ गया, उसके बाद चेता ने अपने बेडरूम मैं गई और खुद को भी पंखे से लटका दिया. और हमेशा के लिए स्वांणी Dear चेता भुलि ने खुद की जिंदगी का सूरज बुझा दिया. 

कहानी का आशय

आज शहर में बसना या बसाना हर किसी का सपना हो गया है गांव तब तक प्यारे हैं जब तक बेरोजगार हैं, या नौकरी लगने का घंमड आ गया है. दूसरों की देखा देखी में कभी निर्णय नहीं लेने चाहिए, या जो दूसरे कर रहें हैं उस राह पर नहीं चलना चाहिए. चेता की ब्वे भी कुछ एैंसे सपने सजो चुकि थी, जिसको शहर पसंद था डांडा मुल्क उसको नहीं भाता था अपनी चाहत के चक्कर में उसने अपनी बेटी की चाहतों का कत्ल कर दिया था. अगर चेता की ब्वे अपनी बेटी का रिश्ता उन पहाड़ी लड़को के साथ करवा देती तो आज चेता जिंदा होती, उसकी जिंदगी और स्वांणी होती. पर क्या कन्न चेता की ब्वे को शहरी मुल्क पसंद था.

लेख:- हरदेव नेगी

7 thoughts on “Dear चेता भुलि”

  1. वाह बहुत सुंदर।।
    दिल्ली देहरादून वालों के पीछे जिंदगी खराब न करो।।

    1. बिलकुल सही बात नीलम जी शहर जो बहार से दीखते है वो सच्च मे उतने सुन्दर है नही, आपका भी धन्यवाद

  2. दीपशिखा गुसाईं

    मार्मिक परन्तु कुछ हद तक सत्य भी ,,

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