Dear औजी दिदा

Dear Auji Dida,
पर कन्न क्या चा दिदा, तुमरा भी सदानि यनि हाल रैन दिदा.
ढोल तांगू त्वैथें समल्दू निचा. अर पैंसा भी त्वे सगत चैंद दिदा.

Dear औजी दिदा, क्या लगौऊं मैं तुम्हारी व्यथा. तुम्हारा तांबा सार ढौल और खल्यारू दमाऊ उत्तराखंड की संस्कृति की सान हैं. उससे से ही उत्तराखंड की संस्कृति की पहचान है,  अगर ये ढोल दमाऊ हमारी आन बान सान हैं  तो  फिर इस ढोल दमाऊ  की  साज को बजाने वाले औजी हमारी सान क्यूं नहीं है. जबकि उस ढोल दमाऊ से  ज्यादा सम्मान तो तुम्हें मिलना चाहिए था. अगर उत्तराखंड के सभी पंचनाम, कुल देवता,  सिद्धपीठ, पांडव, जीतू बग्डवाल, आंछिरी, के  नर  जिन  पर  ये  देवता  अवतरित होते  हैं और  उन  नरों  को  पूरा  सम्मान मिलता  है  तो  जिन औजियों की रिदि सिद्धि ढोल दमाऊ के प्राक्रम विद्या के दम पर ये देवता अवतरित होतें हैं तो उन औजियों को क्यूं  सम्मान नहीं मिलता. जबकि देवता अवतरित कराने  की  कला  ढोल में नहीं अपितु औजियों अंदर होती है. अवतरित होने वाले देवता का हम तो सम्मान करते हैं पर औजियों का क्यूँ नहीं.और ये विद्या हर कोई इंसान नहीं जानता. बड़े बड़े प्रांण प्रतिष्ठान व नेताओं के स्वागत व विदाई आम पहाड़ी जनमानस गाजा बाजा के साथ गुणगान करता है पर इतने दिनों तक तमाम देव कार्य होने के बाद भी औजी का ना तो फूल मालाओं के स्वागत होता है ना ही विदाई. कुछ तो खोया होगा तुम्हारे पुरखों ने इस संस्कृति को बचाने में. कुछ तो सोच कर  उन्होनें इस परंपरा की नीव रखी होगी. और कुछ तो उन्होने भी सोचा होगा जिन्होंने ढोल दमाऊ और औजी के  सम्मान के  बीच एक भेदभाव की दीवार रखी. और  जो  आज तक चली  आ रही है ,

औजियो का तप जप:-

हमारे औजियो के जप तप की छमता इसी बात से आंकी जा सकती है, कि जिनके ढोल दमाऊ के बिना चारों धामो की देव डोली,  तमाम  मुल्क की देवी भगवतियों की  जात यात्रा, यहाँ  तक नंन्दा देवी की डोली टस में मस नहीं हो सकती तो फिर उन औजियों को आज तक क्यूँ हम उत्तराखंड वालों ने निरझस करके रखा है. पांडव हो या जीतू बगड्वाल पूरिया गाथापवांड़ा जैंसो पंचनाम देवता जिनके ढोल दमाऊ के दम पर नाचते व दर्शन देते हैं. तो वो औजी हमारे लिए दार्शनिक क्यूँ नहीं है, यहाँ तक कि इसी ढोल दमाऊ जप तप के कारंण मशहूर जागर सम्राट प्रीतम भरतवाण को पद्मश्री व मानध उपाधि तक भारत व उत्तराखंड सरकार द्वारा दी गई. जिन्होंने इस परपंरा को विश्वपटल तक पहुचायां जिसे समस्त उत्तराखंड की जनता सराहा. तो  फिर जो औजी दिदा हमारे गाँवों के आस पास रहते हैं तो फिर उनकी हम क्यूँ नहीं सराहना करते,  आखिर वो भी हकदार है उस सम्मान के, क्यूँ उनको काम को एक जातीवाद का रूप दिया गया आखिर आज के नये संगीत जगत के संगीतकार ढोल दमाऊ बजाते हैं उनको क्यूँ हम भेदभाव की नजर से नहीं देखते. 

अपणा औजी बिरणां अर् बिराणू नौसाद अपणु:-

अब ब्यो कै  समय भी केवल मांगल स्नान तक सीमित रह गये हमारे औजी दिदा. वो  इसलिए  कि  बल  मांगल  हमारी परंपरा चा तो भलु लगता है  उस  टाईम  पर. पर  अब  मांगल  भी अब गाँव से  निपट कर  डीजे  पर  आ  गये, कुछ  समय  बाद  ढोल  दमाऊ  भी आ  जायेंगे. अपणा  पहाड़  के औजियो  की लाईफ  स्टाईल  अच्छी  नहीं  है बल  जितनी  नौसाद  खान  के  बैंड वाले  की है  बल. वो  तो  अच्छी फैसिलिटी  देता  है बल. उसकी घोड़ी पालकी  उसका  सुरीली भौंण  वाला गायक  बैंड बल  पैंसा  वसूल  भी है और   अपनी  हैसियत  भी पता चलती है. एक ये अपने औजी हैं  बल ना  ढंग  का बाजा  बजाते हैं ना  इनकी भौंण  अच्छी है  ये  इनको  तो 2000 भी ज्यादा ही देते हैं  हम.  वहीं  नौसाद  बैंड  वाले  हैं  उनको  अगर  हम  50000 हजार  भी देते  हैं  तो  वो  पूरे  दिल  से  गाता  है  और  अच्छे  ढोल  बजाता है और पता भी चलता है कि शहर  में  शादी है, एक  ये हमारी औजी  इनके ये फुटे  ढोल. एक तो  बजाते नहीं ढंग से  उपर  से  ठाकुरो  इनाम किताब  दे  दो  बल  कुछ इनको .ये  इनाम  किताब  के लायक थौड़ी  है इनाम  के लायक  तो  नौसाद  बैंड  वाले है  जिनको  एडवांस बुकिंग  और आखिर  में इनाम देने में  जो  परोपकार  हम  पहाड़ियों  को मिलता  है  वो  परोपकार इन  कामचोर औजियों  को देने में  कहाँ मिलता. मामा  फूफा  अगर नोट भी उड़ायेंगे  तो  तो  नौसाद  बैंड वालों  पर उड़ायेंगे ना आखिर रौनक कितनी अच्छी  लगती है उनकी पालकी और देसी बैंड  से.  और  बौजी, स्याली  जेठो जी के ठुमके तो अहा  और  भी थिरकने लगते हैं.

औजियों का पीड़ा :-

आज औजियों की पीड़ा उनके गाजा बाज की ताल के साथ कहीं किसी कोने में दबी है. उनके कांधे पर तांबा के उस ढोल दमाऊ का भार नहीं है जितना कि सामाजिक भेद-भाव का भार है.  मैं तो कहता हूँ औजी दिदा तुम भी अब अपनी आने वाली पीढ़ी को लाड साहब बनाओ क्योंकि जब तुम्हें तुम्हारा सम्मान अभी तक नहीं मिला तो तुम्हारी आने वाली पीढ़ी को कैंसे मिलेगा.  कब तक तुम भी ठाकुरो करते रहोगे और अपने बच्चों को भी इस अंधकार में धकेलते रहोगे. जहाँ एक बिरांणे नौसाद के साथ उठना बैठना है और तुम्हारे साथ उठना बैठना तो दूर की बात है बात करने में भी छोटा पन महसूस होता है. अगर तुम ये सोचते होंगे कि तुम पर देवी देवताओं व वृति बाणी का दोष लगेगा तो क्या आजतक उन पर लगा है जो तुम्हे ज्यादा तवज्जो नहीं देते.  आखिर तुम दोनो अलग कैंसे हो सकते हो. अगर तुम दोनों अलग हैं तो उस नौ बैंणी के धियांण भी एक हैं, डोलेर भी एक है, न्यूतेर भी एक है.  बस एक जो नहीं है वो है सामाजिक सोच.  

लेख:- हरदेव नेगी

2 thoughts on “Dear औजी दिदा”

  1. Bhoot badiya chot ye jhoota riti riwajo par..jo apda purkhu ka saj bajo ki ijjat na kairiki.. dusra logo they apda samjni cha..

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