चुनो कु हेर -फेर

chuno ku her pher,
बड़े दिनों बाद ही सही
गांव चौपालों में रंगत सी दिखी
शायद चुनाव आ गए

दोस्तों तो फिर समय आ गया है वो जिसमें हमारे गाँव क्षेत्र जिले के विकास के पैमाने तय होते हैं और उन पैमानों की बुनियाद रखते हैं हमारे द्वारा चुने गए लोग मतलब कि त्रिस्तरीय पंचायत के चुनाव आ गए हैं. अब पहाड़ो में आजकल खूब खसर बसर हो रही है आखिर वो पांच सालों का इंतजार खत्म हो चला चुनावी पतड़ा आ गया है, उधर से शीटों का भी पता हो गया कहा से किसी शीट है आरक्षित अनारक्षित आधे लोगों की उम्मीदों पर तो दस पास और 3 बच्चों वाले नियम ने पानी फेर दिया था बहुत सारे युवक इस लिए नाराज हैं कि उन्हें चुनाव लड़ना था लेकिन शीट महिला आरक्षित है. तो अब जो शुभकामनाओं वाले पोस्टर 6 महीने से पुरुषों के नाम से छपे वो अचानक उनकी शिक्षित जुझारू कर्मठ धर्मपत्नियों के नाम से दिखने लगे हैं.चलो इन सब बातों से इतर बात करते हैं गाँवों में आई इस आकस्मिक रौनक की लगभग ऐसा भी देखने को मिल रहा कि जो परिवार कुछ विशेष सुख सुविधाओं के लिए पलायन कर चुका है वो कुछ दिनों के लिए ही पर ग्राम भर्मण क्षेत्र भर्मण इत्यादि में लग गया गाँवो के वो अधिकांश बट्टे जो बाँजे पड़ने की कगार पर हैं उनमें आखिर हरियाली आ रही है आजकल । जिन रास्तों में एक मनखी भी नहीं दिखता वो बट्टे-घट्टे भी आबाद टाइप के लग रहे हैं. आजकल चुनाव प्रत्याशी, जिनको की गांव वालों ने कभी देखा भी नहीं होगा घर घर में भादों के मैने के सर्पों की तरह बाहर निकल रहें है एक इस बट्टे से जा रहा तो दूसरा उस बट्टे से आ रहा.

गांव वालों को हाथ जोड़कर खुद को उनकी सेवा में समर्पित करने के तमाम बचन दे रहें जिन्हें निभाने की कोई गारंटी नहीं है,,,,,बल्लू भैजी भी वैसे प्रधान के उम्मीदवार की तैयारी में था पर उनके 3 नौनियाल थे तो सम्भव नहीं हो पाया ,ठीक समय सहित महिला आरक्षित होने पर पैल्या खोला की झुमरी बौजी भी बोलने लगी अबरी दु मि भी अजमोलू हाथ परधनी मा पर कखे बौ त आठ पास भी नि कनिके होलु तब, इस सब के चलते बल्लू भैजी भी बीरू सिंह जी जु की क्षेत्र पंचायत के उम्मीदवार हैं उनका प्रचार प्रसार करने लग गया बीरू सिंह अभी अभी दिल्ली से कंपनी की नौकरी छोड़ कर गांव की तरफ आया था और पढ़ाई भी ज्यादातर बाहर से ही हुई तो गाँव-क्षेत्र को ज्यादा नहीं जानता था,इस लिए बीरू ने बल्लू भैजी को अपने चुनाव का हर्ता कर्ता बना दिया आखिर बल्लू भैजी की पहचान भी दूर दूर तक थी ब्लॉक तहसील में भी रोज आना जाना था इधर उधर के दो चार गाँवो में अच्छी पहचान थी तो बल्लू भैजी भी बीरू को आश्वासन दे चुके थे कि बीरू की जीत की जिम्मेदारी मेरी, उधर गांव में भी खुसर बुसुर हो रही थी कि प्रधान के पद पर चुनाव कौन – कौन लड़ेगा तभी धरमु (जो कि एक ठीक-ठाक दुकानदार है और अच्छा पढा लिखा भी है) ने अपनी धर्मपत्नी को बोला कि इस बार तू ही चुनाव लड़ ले शादी भी नई नई थी तो अभी उसकी पत्नी भी गाँव मे ही रहती थी और अभी अभी उसने बी.ए. भी पूरा कर दिया की भी बहुत अच्छी है और समझदार भी गांव में छोटे बड़ों का आदर करना भी खूब जानती और धरमु भी बढ़िया मिलनसार मददगार है तो आखिरी निर्णय ये हुआ कि धरमु ने अपनी पत्नी को चुनाव के लिए राजी कर दिया और झुमरी बौ तो है ही खूब तर्रार और धरमु के परिवार से भी खूब पटती तो वो भी धरमु की पत्नी के समर्थन में खड़ी हो गयी.

अब बहुत सारे विरोधी भी थे ऐसे में जनता को कुछ तो प्रलोभन देना ही पड़ता आदमियों को तो शाम शाम को कहीं न कहीं से किसी न किसी से दारू मिल जाती, महिलाओं और बच्चों की भी पार्टी हो जा रही खूब भीड़ भाड़ हो रही कभी कोई बिस्किट लेके आता कोई मिठाई कोई साग भुज्जी का इंतजाम कर देता. आजकल अब पहाड़ों में मुर्गों और बखरों की भी रणी-घणी लगने वाली है जगह जगह कांच की बोतल देखने को मिलेगी, बुजर्गों की भी आजकल खूब सेवा हो रही कुल मिला के माहौल गाँवो का देखने लायक हो रखा, अब उम्मीदवार आ रहे तरह तरह की योजनाओं की बात हो रही विकास की एक से एक तरकीब सुझाई जा रही जैसे कि हर बार के चुनाव में किया जाता है,,,अभी भी पांच साल पुराने गिरे पुस्ते गिरे ही हैं हालांकि उस बार के चुनाव में भी उन पुस्तों को ठीक करने के वादे किए गए थे खैर ,, अब क्या बोन,. अब हम किसी दिल्ली देहरादून या गांव से किसी भी शहर में बस चुके उम्मीदवार जो कि गांव ढंग से जाता भी न हो सिर किसी शादी समारोह या किसी की वर्षी पे जाता हो उसे चुनते हैं तो विकास की उम्मीद क्या करी जा सकती,, वो थोड़े न गाँव वालों के सुख दुःखों परेशानियों से वाकिफ होगा तो ऐसे में विकास भी क्या ही हो सकता.

पर इस चुनाव में एक खाश बात जहां तक मुझे देखने को मिला है हर क्षेत्र हर गाँव या जिला पंचायत से युवा वर्ग चुनाव में उम्मीदवारी कर रहा है तो हो सकता पहाड़ो के विकास के पैमाने बदल जाए और शोशल मीडिया में भी एक बात नोट की मैंने की इस बार कर्मठ जुझारू से पहले एक और बहुत ही सम्मानित शब्द जोड़ लिया गया है ‘शिक्षित’ तो उम्मीद करते हैं कि इस शब्द मात्र से विकास की और इस शब्द के सम्मान की कि अब विकास सम्भव हो पायेगा और हो भी.

आज मैंने फिर हंसते देखा बूढ़ा पीपल गांव में
अजब सी हरियाली थी दामन में
कि गांव के युवा चर्चा कर रहे थी इसकी छांव में,

धन्यवाद दोस्तों,,
इस चुनावी प्रक्रम में प्रकृति और पर्यावरण को भूल नहीं जाना इसके साथ सन्तुलन बनाये रखना कूड़ा कचरा गन्दगी बिल्कुल नहीं फैलाना क्योंकि हम सबका खुशहाल जीवन प्रकृति की अनुपम एवं अमूल्य दें है.

लेख : – नीलम रावत

2 thoughts on “चुनो कु हेर -फेर”

  1. बहुत सुन्दर लेख लिखा है आपने गाँव की वर्तमान राजनीतिक चहल-पहल पर,उम्मीद है अब जो नया शिक्षक वर्ग त्रिस्तरीय पंचायत भाग लेगा,शायद वे गाँव की अहमियत समझे और गाँव को विकासात्मक दिशा प्रदान करा सके।।

  2. Sanjay सुन्दर घाटी देहरादून। Kathait

    बहुत ही सुंदर लेखनी 🙏🙏☺☺

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