बौजी का दिल्ली सफर

Bauji Ka Dilli Safar
बौजी का दिल्ली सफर की झरफर

भैजी ने  ब्यो का बाद बौजी को दिल्ली साथ  में ले जाने की सोची और तुरंत ब्यो के द्वी महीने बाद बौजी दिल्ली पैट गई. बौजी का गाँव दूर रुद्रप्रयाग के  डांडा मुल्क रांसी था, बौजी खूब बिगैरली व  स्वांणी बांद सी थी, पास  के  इंटर कॉलेज से  बारवीं तक पढ़ी थी,  भैजी ठीक ठाक पढ़ा था और दिल्ली की एक कंपनी में सुटरवाईजर था. अब जब नया नया ब्यो होता है तो गात में कबलाट होना आम बात है, तब स्वींणा भी खूब रंगमत्या मिजाज के आते हैं, गीतों में भी बदलाव आने लगता है, और तेरे मेरे होंठो पर मीठे मीठे गीत में खुद किरदार नजर आने लगता है, भले  खुद  कभी ज्वानि में लस्का-डस्का ना लगायें हों  पर  ब्यो  के  लस्का-डस्कों की  बात कुछ और  है

अब  जब  बौजी  दिल्ली पहुँची तो  कुछ  दिन  अटपटा लगने  लगा, भैजी  सुबेर ड्यूटी  चले  जाते थे तो भैजी  दिन  भर कमरे  पर  यखुलि यखुलि बोर  हो  जाती  थी, टीवी सीरियल भी  देखे  पर  देखे  कितने. भैजी  लंच  टाईम  पर  ही  बौजी  को  फोन  कर  पाता  था, फिर  कभी  कभी  बौजी  को  आसपास  के  बजार ही  घुमाता था. जिससे  बौजी को  दिल्ली  के  बाजार  में  ब्याखुनी बगत  साग  भुज्जि  मोल्याने  का  अनुभव  हो  जाए. भैजी  की  रविवार को  ही  छुट्टी रैती थी, पर  बौजी  का  सरील  अभी  भी  गौं  की  तरफ  रहता  था, एक  सगत स्मार्ट  फोन  भैजी  ने  बौजी  को  लाकर  दिया  जिससे  लंच टाईम  पर बौजी  की स्वांणी अन्वार देखकर जिकुड़ा  स्येली  पढ़  जाये. अब  भैजी  ने  भी एक  हेडफोन  ले  लिया  था  जैंसे  मैट्रो में पहुँच जाता बौजी  से  छ्वीं बथ लगाने  में भैजी  का  टैम  कट जाता. और  भैजी के  चेहरे  की  फीलिंग ही  कुछ  और  रैती  थी. एक दिन भैजी ने  सोचा  क्यूँ ना  बौजी  को  कुतुब मिनार  घुमाने  ले  जाऊं, और  आखिरकार  रविवार को  वो  दिन  आये  गया, बौजी  ने  सुबेर उठकर बौजी  के  लते कपड़े धुले व  नास्ता बनाया और  ख़ुद पहाड़ी बांद बनकर तैयार हो गई.  फिर भैजी के साथ अक्षर धाम मैट्रो स्टेशन पर पहुँची, पहले तो टोकन वाले गेट पर बौजी को रगरयाट् होने लगा,  फिर स्वचलित सीड़ी पर बौजी खुटा रखने से डर रही थी, सोचो  जिस बौजी के पैर ऊंचा बीठा पाखों, डाल्यों के टुख चड़ने में नहीं कांपे आज उस बौजी के पैर स्वचलित सीड़ी में चड़ने से कांप रहे थे. पर आखिर कार  बौजी को सांसू आ ही गया और भैजी का हाथ पकड़कर मैट्रो में चल पड़ी.

राजीव चौक मैट्रो स्टेशन की भीड़ देखकर बौजी की आंखे रींगने लगी और कहने लगि बल्  हे ब्वे इथगा निमका मनखि कक्ख बटि एैन. भीड़ को देखते हुए भैजी ने बौजी का हाथ टाईट पकड़ लिया और पीली लाईन की मैंट्रो की तरफ चलने लगे सीड़ीयों से नीचे की तरफ जैंसे उतर रहे थे की मैट्रो भी झट आकर रुकी थी और भैजी ने बौजी को सरासर हिटने को कहा, पर  बौजी ज्यादा तेज नहीं हिट पा रही थी मैट्रो की सीड़ीयों पर एक हाई हील वाली सेंडल ऊपर से राजीव चौक मैट्रो की भीड़. जैंसे ही सीड़ीयां खत्म हुई भैजी ने और तेज हिठना शुरू कर दिया कि कहीं गेट ना बंद हो जाए आगे भैजी और पीछे बौजी, जैंसे भैजी मैट्रो के गेट के नजदीक बड़े पीछे की तरफ से एक भीड़ी आई भैजी को जोर का धक्का मारकर मैट्रो के अंदर ले गई और बौजी का हाथ छूट गया, और  बौजी बाहर और गेट झठ करके बंद. अब भैजी के लिए सनि का काम हो गये है, इतने में भैजी ने अंदर से ही बौजी हाथों से  सनकाया कि तू यहीं पर रह में अभी आता हूँ. पर  बौजी इशारा समझ गई, अक्सर नये नये ब्यो के बाद इशारों में सनकाया जाता है. पर  बौजी थी ही लाटी वहीं पर खड़ी रह गई जहाँ  पर  मैट्रो के  गेट खुलते  हैं  एैंसा ना कि थौड़ा फुंडे  सरक जाऊं, इतने बौजी के पीछे दो चार लड़कियां व लड़के खड़े हो गये और मैट्रो का  इंतजार करने  लगे  भैजी दूसरे मैट्रो पर उतर गये और ताती पीड़ा  की तरह वापस राजीव चौक वाली मैट्रो प्लेटफार्म की तरफ दनकने लगे, उधर जहाँ पर  बौजी  खड़ी थी मैट्रो आकर रुकि भितर की सवारी उतरी थी कि पीछे वालों की  धक्का रौली में बौजी सीधे मैट्रो के अंदर, और  भीड़ इतनी  की  बौजी की  मुख़ड़ी दरवाजे के सीसे पर  चिपक सि  गई, बौजी को  कुछ  कन्न ब्वोन नहीं  आया, और बौजी सीधे गुड़गांव की तरफ, अब  किसे  पूछे  क्या  पूछे, ना  क्वी जांण पच्छांण, बौजी की स्वांणी मुखड़ी रुंणांदी हो गई, इधर भैजी राजीव चौक पहुंचे और देखा कि  बौजी है ही नहीं वहाँ पर, यनै तनै मुंडि फरकाई पर बौजी नजर नि आई,  भैजी अब छिड़ा छिड़ी में फंस गये, अब किसको पूछे क्या पूछे. फोन करने की कोशिश की पर  वो भी नोट रीचेबल, क्योंकि अंडर ग्रांउड होने कज कारण नैटवर्क नहीं आते उपर से  आईडिया का नैटवर्क, भैजी सीड़ीयों पर आकर बैठ गये और  और मुंड पर हाथ रखकर सोच में पढ़ गये, एक तो मैट्रो उपर चिंता होने पर बीड़ी सिगरेट भी कहाँ से सुलगानी थी, कि तब तक भैजी चड़म उठे  और सीआईएस एफ के कंट्रोल रूम की तरफ दनकनै लगे  और  वहाँ बैठे  अधिकारी से सब कुछ  बता दिया  और  मोबाइल में अपने फेसबुक डीपी से ही बौजी की सकल बताई. वहाँ बैठे अधिकरी ने सभी मैट्रो स्टेशन अधिकारियों को सूचित कर दिया. अब तक बौजी हौजखास से आगे निकल चुकि थी की, और  यहाँ भैजी की सांस निकल रही थी,  कहाँ अब तक भैजी कुतुबमिनार मैट्रो पहुँच जाता कहां भैजी का यहाँ फजितु बना पड़ा है.

 बौजी मैट्रो में दरवाजे के सारे खड़ी थी और कदूंड़ी स्पीकर की तरफ लगे थे कि अगला स्टेशन कौन सा है  कुतुब मिनार पहुंचते ही बौजी भी मैट्रो से साहस करती हुई बाहर आ गई, पर  जांण कै बाटा,  इसका कुछ अता पता नहीं और टोकन भैजी कै पास, भैजी ने फिर बौजी को फोन लगया और इस बार फोन लग गया, और बौजी ने भैजी को कहा कि मैं कुतुबमिनार पहुँच गई मैट्रो से. भैजी ने ये बात सीआईएसएफ अधिकारी को बताई, तब अधिकारी ने  कुतुबमिनार मैट्रो के अधिकारी से सम्पर्क किया और बौजी का के  बारे  में  बता कर  वहीं  पर रोकने को कहा, अब  भैजी  की थौड़ा जान  में  जान आई,  और  कुतुब मिनार की तरफ चल पढ़े, कुतुबमिनार पहुंचते ही दोनो  में  खूब गिच्चे की हुई,  बौजी ने भैजी को  कहा  जब  नी  तुमरा बसकी बात हाथ  थामणें की  किलै छौ  पकड़ी  का रख्यूं  म्येरू  हाथ, सु मै  कुतुबमिनार उतरिग्यों नितर छूटी छो  आज  हमरु  साथ. बड़ा अय्यां  घुमौण वाला. फिर भैजी ने बौजी को कहा यार तू ज्यादा बक़ड़ी बकड़ी मत कर पहले ही दो बज गये तेरे चक्कर में, अब  सरासर हिट फिर द्वी चार सेल्फी लेते हैं.

लेख:- हरदेव नेगी

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